हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : पेंशन कर्मचारी का अधिकार है, दया नहीं, 30 साल बाद 83 वर्षीय विधवा को मिला हक

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : पेंशन कर्मचारी का अधिकार है, दया नहीं, 30 साल बाद 83 वर्षीय विधवा को मिला हक

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हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : पेंशन कर्मचारी का अधिकार है, दया नहीं, 30 साल बाद 83 वर्षीय विधवा को मिला हक
हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : पेंशन कर्मचारी का अधिकार है, दया नहीं, 30 साल बाद 83 वर्षीय विधवा को मिला हक

चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पेंशन को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और मानवीय निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पेंशन कोई खैरात, दया या अनुदान नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी द्वारा अपनी सेवा के दौरान अर्जित किया गया एक कानूनी अधिकार है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बराड़ ने 83 वर्षीय बुजुर्ग महिला बदका देवी को पिछले तीन दशकों से लंबित पारिवारिक पेंशन जारी करने के आदेश दिए हैं। 30 साल का लंबा इंतजार और विभाग की दलीलें याचिकाकर्ता बदका देवी के पति स्वर्गीय राम दास लुधियाना इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट में माली के पद पर कार्यरत थे, जिनका 1991 में निधन हो गया था। पति की मृत्यु के बाद से ही बुजुर्ग महिला पेंशन, एरियर, एलटीसी और मेडिकल भत्तों के लिए दर-दर भटक रही थीं। राज्य सरकार ने कोर्ट में दलील दी कि याचिकाकर्ता ने आवेदन करने में बहुत देरी (करीब 30 साल) की है, इसलिए यह याचिका खारिज की जानी चाहिए।
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: “देरी के आधार पर हक नहीं छीन सकते”

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : पेंशन कर्मचारी का अधिकार है, दया नहीं, 30 साल बाद 83 वर्षीय विधवा को मिला हक
हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : पेंशन कर्मचारी का अधिकार है, दया नहीं, 30 साल बाद 83 वर्षीय विधवा को मिला हक


हाईकोर्ट ने सरकार की दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए कहा, पेंशन का दावा एक “निरंतर चलने वाला अधिकार” है। हर महीने पेंशन का भुगतान न होना एक नया कारण (Cause of Action) पैदा करता है। केवल अशिक्षा या जानकारी के अभाव में हुई देरी के आधार पर किसी बुजुर्ग को उसके जीवित रहने के हक से वंचित नहीं किया जा सकता।
6% ब्याज के साथ बकाया भुगतान के निर्देश
न्यायालय ने राहत प्रदान करते हुए आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को याचिका दायर करने की तिथि से 3 वर्ष पूर्व तक का पूरा बकाया (Arrears) 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ दिया जाए। अगले चार सप्ताह के भीतर नियमित पारिवारिक पेंशन और अन्य सभी भत्तों का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
बुजुर्गों के लिए बड़ी राहत
याचिकाकर्ता की अधिवक्ता गीतांजलि छाबड़ा ने इस फैसले को मील का पत्थर बताते हुए कहा कि यह निर्णय उन हजारों बुजुर्गों के लिए उम्मीद की किरण है जो तकनीकी कारणों या विभागीय लेटलतीफी की वजह से अपनी पेंशन से वंचित हैं। 83 वर्ष की आयु में मिली यह कानूनी जीत न्यायपालिका के प्रति आम जन के विश्वास को और मजबूत करती है।

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