
राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: SI भर्ती परीक्षा 2021 रद्द
जयपुर, राजस्थान: राजस्थान हाईकोर्ट ने सब-इंस्पेक्टर (SI) भर्ती परीक्षा 2021 को रद्द करने का ऐतिहासिक और दूरगामी असर डालने वाला निर्णय सुनाया है। यह फैसला न्यायमूर्ति समीर जैन की खंडपीठ द्वारा सुनाया गया, जिन्होंने 14 अगस्त को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था और अब 28 अगस्त को यह फैसला सार्वजनिक किया गया। इस निर्णय ने न केवल राज्य में भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका अब भर्ती में किसी भी प्रकार की अनियमितता या भ्रष्टाचार को कतई बर्दाश्त नहीं करेगी।
यह मामला लगभग एक साल पहले उस समय सामने आया जब 13 अगस्त 2024 को कई याचिकाकर्ताओं ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कर SI भर्ती परीक्षा 2021 को रद्द करने की मांग की। याचिकाओं में यह आरोप लगाया गया था कि परीक्षा प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं, पेपर लीक, सॉल्वर गैंग और तकनीकी खामियों के चलते निष्पक्षता प्रभावित हुई है। आरोप यह भी थे कि कुछ अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ मिला, जिससे मेधावी और योग्य उम्मीदवारों का हक मारा गया।
राज्य सरकार ने अपने पक्ष में यह दलील दी कि परीक्षा के इतने आगे बढ़ जाने के बाद, और चयन सूची जारी हो जाने के बाद अब इसे रद्द करना न तो व्यावहारिक है और न ही न्यायसंगत। सरकार ने यह भी कहा कि यदि कुछ गड़बड़ियां हुई भी हों, तो उनपर जांच के बाद व्यक्तिगत स्तर पर कार्रवाई की जा सकती है, न कि पूरी परीक्षा को रद्द करना उचित होगा। इसके अलावा, जो अभ्यर्थी परीक्षा में सफल हुए थे और चयन सूची में आए थे, उन्होंने भी परीक्षा रद्द करने का पुरजोर विरोध किया। उनका तर्क था कि पूरी मेहनत से परीक्षा पास करने के बाद अब चयन रद्द किया जाना उनके साथ अन्याय होगा।
लेकिन, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को दरकिनार करते हुए यह स्पष्ट किया कि जब तक परीक्षा की मूल प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में हो, तब तक उसमें हुए चयन को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि भर्ती की निष्पक्षता और पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण है, और यदि उस पर प्रश्नचिह्न लग जाए, तो पूरी प्रक्रिया को नए सिरे से शुरू करना ही न्यायोचित कदम होगा। अदालत ने यह भी कहा कि “कुछ की गलती का खामियाजा सभी को भुगतना पड़े”, यह तर्क भले ही कठोर लगे, परंतु कानून की दृष्टि से आवश्यक है कि प्रक्रिया संदेह से परे हो।
यह फैसला राजस्थान सरकार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। अब सरकार को पूरे मामले की समीक्षा करनी होगी और भविष्य के लिए नई भर्ती प्रक्रिया का खाका तैयार करना होगा। साथ ही, जिन अभ्यर्थियों का चयन हो चुका था, उन्हें भी अब दोबारा परीक्षा की तैयारी करनी पड़ सकती है। वहीं, जिन उम्मीदवारों ने पहले अवसर पर चयन से वंचित रहने के बावजूद न्याय के लिए लड़ाई लड़ी, उनके लिए यह फैसला उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है।

इस फैसले के दूरगामी प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं। एक ओर जहां यह भर्ती परीक्षाओं की शुचिता को बनाए रखने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा, वहीं दूसरी ओर यह सभी सरकारी एजेंसियों और भर्ती बोर्ड्स के लिए यह चेतावनी भी है कि किसी भी प्रकार की लापरवाही या भ्रष्टाचार को अदालतें गंभीरता से लेंगी। कोर्ट का यह सख्त रुख भविष्य में अन्य विवादास्पद परीक्षाओं के मामलों को प्रभावित कर सकता है।
साथ ही, इस निर्णय ने यह भी दर्शाया कि अभ्यर्थियों द्वारा दायर की गई याचिकाएं केवल व्यक्तिगत हितों की पूर्ति नहीं थीं, बल्कि एक व्यापक व्यवस्था में सुधार की मांग थीं। कोर्ट ने उन युवाओं की आवाज को सुना, जो न्याय के लिए कानूनी मार्ग अपनाकर सिस्टम की खामियों को उजागर कर रहे थे। इस पूरी प्रक्रिया ने यह साबित कर दिया कि न्यायपालिका में विश्वास और संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करके भी बदलाव लाया जा सकता है।
अब सवाल उठता है कि आगे की प्रक्रिया क्या होगी? सरकार को चाहिए कि वह इस निर्णय को सम्मानपूर्वक स्वीकार करते हुए जल्द से जल्द एक पारदर्शी और निष्पक्ष पुनः भर्ती प्रक्रिया प्रारंभ करे। साथ ही, इस बार यह सुनिश्चित किया जाए कि परीक्षा प्रक्रिया में तकनीकी एवं प्रशासनिक स्तर पर ऐसी कोई कमी न रह जाए, जिससे भविष्य में पुनः विवाद उत्पन्न हों। इसके लिए एक स्वतंत्र एजेंसी के माध्यम से परीक्षा आयोजित करने पर भी विचार किया जा सकता है।
राजस्थान जैसे बड़े राज्य में जहां बेरोजगारी एक गंभीर मुद्दा है, वहां SI जैसी पदों की भर्ती युवाओं के लिए एक बड़ा अवसर होती है। इसलिए, इन अवसरों को पारदर्शिता, निष्पक्षता और मेरिट के आधार पर प्रदान करना न केवल उम्मीदवारों के लिए आवश्यक है, बल्कि समाज की कानून व्यवस्था और पुलिस व्यवस्था की गुणवत्ता के लिए भी आवश्यक है।
अंततः यह निर्णय न केवल एक परीक्षा को रद्द करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संदेश है कि व्यवस्था में यदि गड़बड़ियां हैं, तो उन्हें न्यायिक हस्तक्षेप से सुधारा जा सकता है। यह युवाओं के लिए भी एक प्रेरणा है कि वे अपने अधिकारों के लिए संवैधानिक तरीकों से लड़ सकते हैं और जीत भी सकते हैं।
राजस्थान हाईकोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला राज्य में भर्ती प्रक्रियाओं के लिए एक नई दिशा तय करेगा और प्रशासन को भी चेतावनी देगा कि अब समय आ गया है कि हर प्रक्रिया को पारदर्शी, जवाबदेह और भरोसेमंद बनाया जाए। न्याय के इस विजय के साथ यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले समय में भर्ती परीक्षाएं अधिक निष्पक्ष होंगी और योग्य उम्मीदवारों को उनका हक समय पर और सही तरीके से मिलेगा।

