
जोधपुर। जोधपुर कमिश्नरेट का केरू क्षेत्र आज एक ऐसे सवाल से जूझ रहा है, जिसका जवाब देने की हिम्मत शायद ही किसी अधिकारी या सफेदपोश नेता में हो। राजीव गांधी नगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली केरू चौकी के प्रभारी उप निरीक्षक किशोर सिंह का तबादला केवल एक रूटीन प्रक्रिया नहीं, बल्कि ईमानदारी के सीने पर माफिया का सीधा प्रहार नजर आता है।
जब एक जांबाज अधिकारी बजरी और रेत माफिया की कमर तोड़ने लगता है, तो उसे ‘इनाम’ के तौर पर तबादला थमा दिया जाता है। ग्रामीणों का आरोप है कि किशोर सिंह के सख्त पहरे ने अवैध खनन करने वालों की नींद उड़ा दी थी। लेकिन सवाल यह है कि: क्या बजरी माफिया इतना रसूखदार हो गया है कि वह पुलिस मुख्यालय की फाइलों तक अपनी पहुंच रखता है?
क्या खाकी पर अब माफिया का कब्जा है, जो अपनी मर्जी से अधिकारियों की तैनाती और विदाई तय कर रहा है?
केरू की गलियों और चौपालों पर आज मायूसी और गुस्सा है। ग्रामीणों का दर्द सीधा है—”अगर कोई अधिकारी हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने और अवैध खनन रोकने के लिए लड़ता है, तो उसे व्यवस्था से बाहर क्यों कर दिया जाता है?”
व्यवस्था पर चोट: यह तबादला एक ईमानदार अधिकारी का नहीं, बल्कि आमजन के उस भरोसे का है जो उन्होंने पुलिस प्रशासन पर किया था।

निशाने पर न्याय: बुजुर्गों और युवाओं का एक ही सवाल है कि क्या सच में सिस्टम में ‘ईमानदारी’ सबसे बड़ी कमजोरी बन चुकी है?
यह घटनाक्रम जोधपुर कमिश्नरेट की कार्यशैली पर एक गहरा काला धब्बा है। आज केरू की हवाओं में एक ही सवाल गूंज रहा है:
क्या सरकार और पुलिस के आला अधिकारी माफिया के इस ‘सिंडिकेट’ को तोड़ने की हिम्मत दिखाएंगे?
क्या किशोर सिंह के तबादले की निष्पक्ष जांच होगी, ताकि जनता जान सके कि इस फाइल के पीछे किसका ‘हाथ’ था?
आखिर कब तक ईमानदारी की कीमत ऐसे तबादलों से चुकानी पड़ेगी?
“ईमानदारी की कीमत कब तक चुकानी पड़ेगी?” – केरू के ग्रामीणों की यह आवाज अब केवल एक गांव की नहीं, बल्कि समूचे राजस्थान की व्यवस्था से की गई एक भावुक मगर बेहद सख्त अपील है। अगर समय रहते सच्चाई सामने नहीं आई, तो माफिया का मनोबल इस कदर बढ़ जाएगा कि भविष्य में कोई भी अधिकारी माफिया के खिलाफ हाथ डालने की जहमत नहीं उठाएगा।

