
उदयपुर | पर्यटन नगरी उदयपुर में इन दिनों सिगरेट की कीमतों में आग लगी हुई है। शहर के प्रमुख बाजारों से लेकर गली-मोहल्लों तक सिगरेट की कालाबाजारी (Black Marketing) धड़ल्ले से जारी है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह खेल केवल छोटे रिटेल दुकानदार ही नहीं, बल्कि बड़े होलसेलर्स के स्तर पर भी खेला जाएमआरपी (MRP) से 10 से 20 प्रतिशत अधिक वसूली शहर के सूरजपोल, देहलीगेट, हाथीपोल और हिरणमगरी जैसे क्षेत्रों में सिगरेट के पैकेट पर अंकित अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) से ₹10 से ₹50 तक अतिरिक्त वसूले जा रहे हैं। जब उपभोक्ता इसका विरोध करते हैं, तो उन्हें ‘पीछे से माल महंगा आने’ या ‘स्टॉक की कमी’ का हवाला देकर चुप करा दिया जाता है।
होलसेलर्स का ‘सिंडिकेट’ बना मुसीबत
जांच में सामने आया है कि कुछ बड़े होलसेलर्स ने सिगरेट का कृत्रिम अभाव (Artificial Scarcity) पैदा कर दिया है। रिटेल दुकानदारों का आरोप है कि उन्हें होलसेल रेट पर ही माल एमआरपी के करीब मिल रहा है, जिसके कारण वे ग्राहकों से अधिक पैसे लेने को मजबूर हैं।

बिना रसीद का धंधा : कालाबाजारी के इस खेल में अधिकांश लेनदेन कच्ची पर्चियों पर हो रहा है, ताकि जीएसटी और प्रशासन की नजरों से बचा जा सके।
कानून की सरेआम धज्जियां : विधिक माप विज्ञान अधिनियम (Legal Metrology Act) के तहत एमआरपी से एक रुपया भी अधिक वसूलना दंडनीय अपराध है। इसके बावजूद, उदयपुर में प्रशासन की सुस्ती के चलते यह अवैध वसूली एक ‘नया सामान्य’ (New Normal) बन गई है।
आलोचनात्मक सवाल और प्रशासन की चुप्पी : सवाल-क्या रसद विभाग (Logistics Dept) और नापतोल विभाग को इस खुलेआम लूट की भनक नहीं है? क्या यह कृत्रिम कमी किसी बड़ी कीमतों में बढ़ोतरी की आहट है या केवल मुनाफाखोरी का एक संगठित जरिया? जब हर सिगरेट के पैकेट पर स्पष्ट कीमत लिखी है, तो दुकानदार खुलेआम ज्यादा पैसे मांगने की हिम्मत कैसे जुटा पा रहे हैं?

