
भीलवाड़ा (प्रकाश जैन चपलोत)। शहर का आज़ाद चौक शहर की धड़कनों में से एक माना जाता है, लेकिन आज यह चौक जिन समस्याओं से जूझ रहा है, वह न केवल प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करता है बल्कि शहर की नागरिक व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। वर्षों से यहाँ फैलते अतिक्रमण ने सार्वजनिक स्थानों को निगल लिया है। दुकानों के आगे तक पसरे ठेले, बिना किसी नियंत्रण के खड़े वाहन और अव्यवस्थित भीड़ इस क्षेत्र को धीरे-धीरे नर्क समान बना रही है। लेकिन समस्या यहीं खत्म नहीं होती। अब नालियों से उफनकर सड़कों पर फैलने वाली गंदगी ने मानो कोढ़ में खुजली का काम कर दिया है। जिस मार्ग से हजारों लोग रोज गुजरते हैं, वहां बदबूदार और गंदे पानी के बीच चलना मजबूरी बन चुका है। दुपहिया वाहन निकालना तक चुनौती है, और जब इस तंग इलाक़े में चारपहिया वाहन घुसते हैं, तो स्थिति असहनीय जाम में बदल जाती है।
भुट्टे, पानी-पताशे और फल-फ्रूट के ठेले अपने स्थान से टस से मस नहीं होते—

चाहे जाम लगे या आपातकालीन स्थिति बन जाए। यह दृश्य केवल अव्यवस्था का नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता का भी उदाहरण है। विडंबना यह है कि शहर के सर्वाधिक व्यस्ततम बाज़ारों में से एक होने के बावजूद इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं दिखता।
सवाल यह नहीं कि आज़ाद चौक गंदगी और अतिक्रमण का शिकार क्यों है—सवाल यह है कि इतनी स्पष्ट समस्याओं के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं होती? शहर की नब्ज़ जिस स्थान पर टिकी हो, वहां की अनदेखी न केवल असंवेदनशीलता है, बल्कि भविष्य के बड़े संकटों का संकेत भी है।
शहर को सुव्यवस्थित रखना सिर्फ प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, नागरिकों की सहभागिता भी आवश्यक है। लेकिन जब दोनों ही अपनी भूमिका सही ढंग से नहीं निभा पाते, तो परिणाम आज़ाद चौक जैसा ही होता है—जहाँ आज़ादी सिर्फ नाम में रह जाती है, और बदहाली रोज़मर्रा की नियति बन जाती है

