अगर कोई व्यक्ति किसी जिम्मेदार व्यक्ति से कुछ आवश्यक जानकारी प्राप्त करना चाहे और उत्तर देने वाला उत्तर देने के बजाय उपरोक्त शब्द का प्रयोग करे तो सुनने वाले को कैसा महसूस होगा ? और तुर्रा उस पर यह हो कि पूछने वाला वरिष्ठ पत्रकार हो और जवाब देने वाला जिला अस्पताल का जिम्मेदार डाक्टर हो। स्वाभाविक है यदि प्रश्नकर्ता कूल माइंडेड न हो तो जवाब देने वाले का मुंह फटे जूते या सूखे हुए नेनुआ की तरह होने में देर नहीं लगेगी। फिर चाहे घटनास्थल कोई भी जगह हो।
जी हाँ कुछ ऐसा ही विगत दिवस जिला अस्पताल जौनपुर में देखने को मिला।
हुआ यह कि पुरानी बाजार क्षेत्र से एक मरीज अस्पताल पहुंचा जिसे बोलने में असुविधा हो रही थी। उस मरीज ने अपने परिचित वरिष्ठ पत्रकार से फोन पर अपनी समस्या बताई और अस्पताल ले चलने को कहा। पत्रकार ने जिला अस्पताल जाने की सलाह दी। चूंकि मरीज को दिक्कत हो रही थी इसलिए उसके परिजन उसे लेकर स्वयं अस्पताल आ गये और पत्रकार को वहीं बुलवाया। पत्रकार ने इमरजेंसी पर मौजूद डाक्टर से बात की जिसमें यह जानकारी मिली कि अभी एडमिट कर ले रहे हैं,दिल से संबंधित समस्या लग रही है,अगर यहाँ से कंट्रोल हो गया तो ठीक अन्यथा बीएचयू (मेडिकल कालेज,वाराणसी) बेहतर इलाज के लिए रेफर किया जायेगा। दूसरे दिन मरीज को देख रहे डाक्टर प्रभात कुमार ने मरीज की भोली भाली पत्नी से भर्ती पेपर पर यह लिखवा लिया कि हम बीएचयू जाने में असमर्थ हैं मेरे पास पैसा नहीं है,जो कुछ होगा उसकी सारी जिम्मेदारी हमारी है,आदि आदि और हस्ताक्षर करवा लिया।
इसके बाद ट्रीटमेंट बंद करवा दिया और चला गया।
उस दिन पत्रकार शहर से बाहर थे अगले जब वह अस्पताल आये तो पता चला कि इलाज कल से ही बंद है। पत्रकार ने अपने संगठन के मंडल अध्यक्ष को सारा घटनाक्रम बताया जिन्होंने सीएमएस से बात की जिस पर सीएमएस ने पत्रकार को इलाज से संबंधित सारी बातें विधिवत समझा दी। पत्रकार ने भी परिजन को सीएमएस की बातों का अनुसरण करने के लिए कहा।इसी दौरान परिजन ने निवेदन किया कि एक बार और चेक करवा दें कि कोई तथ्य छूट तो नहीं गया है जिस पर सीएमएस ने पूरी संवेदनशीलता के साथ डाक्टर प्रभात कुमार को मरीज के पास फाइनली चेक करने के लिये भेजा।
बदतमीजों का सरदार,डॉक्टर प्रभात कुमार,काबिलियत पर हावी जाहिलियत
वहाँ पर उपस्थित पत्रकार जैसे ही
प्रभात कुमार के सम्मुख प्रभात कुमार की ओपिनियन जानने के लिये आये, वैसे ही बदतमीजी और बेहूदगी का प्रदर्शन करते हुए प्रभात कुमार ने पत्रकार से कहा कि,कौन हो बे तुम, इस अनपेक्षित हमले से पत्रकार सन्न रह गये और तुरंत अपना परिचयपत्र दिखाया जिस पर डाक्टर के भेष में छिपे गुंडे ने फिर कहा,इसे हटा और हट किनारे चूतिया। पत्रकार ने बेहूदे डाक्टर से उलझने से बेहतर सीएमएस शिकायत करना बेहतर समझा। सीएमएस ने माना कि बदतमीज डाक्टर की अक्सर शिकायत आती रहती है लेकिन कामकाज प्रभावित न हो इसलिए कभी समझा देते हैं कभी उपेक्षित कर देतें हैं।
लेकिन इस मामले में माफी मंगवा देंगे।
प्रभात कुमार मरीज को नर्सिंग होम में भर्ती करने के फिराक में था लेकिन पत्रकार की मौजूदगी में दाल गल नहीं रही थी।चूंकि प्राथमिकता मरीज को बेहतर इलाज के लिये बीएचयू की थी इसलिए पत्रकार ने पहले मरीज को वाराणसी रवाना करवाया। पूछने पर पत्रकार ने बताया कि बेहूदा प्रभात कुमार जब से अस्पताल में आया है तब से इसी तरह मरीजों को आतंकित करता रहता है। अस्पताल से बाहर की दवाइयाँ लिखना और खास दूकान से ही खरीदने के लिए जोर डालना,अन्यत्र से खरीदने पर वापस करवा देना इसकी आदत बन चुकी है।
इसी डाक्टर के द्वारा मरीजों व पत्रकारों से दुर्व्यवहार पर कुछ महीने पूर्व अस्पताल में हंगामा हुआ था।इस डाक्टर की पोस्टिंग नक्सलाइट एरिया या किसी मंत्री की मेडिकल टीम में होनी चाहिए न कि जौनपुर जैसे शांत और संवेदनशील जगह पर। काबिलियत तो कम दिखी परन्तु जाहिलियत कूट कूट कर भरी हुई दिखी। इस तरह के डाक्टर अस्पताल की शांति अपनी हरकतों से कभी भी भंग कर सकते हैं।
सीएमओ को भी इस गुंडई की जानकारी दी जायेगी।
सीएमओ को संज्ञान लेना चाहिए।एक तरफ गुंडे किस्म के प्रभात कुमार जैसे डाक्टर जिला अस्पताल की नाक कटवा रहे हैं वहीं इसी अस्पताल में डाक्टर सैफ हुसैन, डाक्टर अमरदीप,डाक्टर के.के. राय जैसे अन्य कई डाक्टर्स भी हैं जो मृदुभाषी होने के साथ साथ मरीजों और परिजनों के बीच देवता के समान लोकप्रिय हैं। फिलहाल इस बदतमीजी के विरुद्ध कार्यवाही पत्रकार द्वारा की जरूर की जायेगी ऐसा संकेत पत्रकार के एक्शन से प्रतीत हुआ।