बाल विवाह को लेकर बालिकाओं को किया जागरूक

बाल विवाह को लेकर बालिकाओं को किया जागरूक

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बाल विवाह को लेकर बालिकाओं को किया जागरूक
बाल विवाह को लेकर बालिकाओं को किया जागरूक

टोंक जिले के युसुफपुरा स्थित राजकीय देवनारायण आवासीय विद्यालय में एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य बाल विवाह के खिलाफ समाज में चेतना फैलाना और बालिकाओं को उनके अधिकारों के प्रति सजग करना था। यह कार्यक्रम “बाल विवाह मुक्त राजस्थान अभियान” के अंतर्गत आयोजित किया गया, जिसमें विद्यालय में अध्ययनरत बालिकाओं को बाल विवाह अधिनियम 2006 के मुख्य प्रावधानों से अवगत कराया गया।

इस अवसर पर जिला बाल संरक्षण इकाई के सहायक निदेशक नवल खान ने बालिकाओं को संबोधित करते हुए बाल विवाह के कारणों और इसके गंभीर दुष्परिणामों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बाल विवाह केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि यह बालिकाओं के भविष्य, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता के मार्ग में एक बड़ी बाधा है। बाल विवाह के चलते बालिकाओं को शिक्षा अधूरी छोड़नी पड़ती है, जिससे वे आत्मनिर्भर नहीं बन पातीं। इसके अलावा किशोरावस्था में विवाह और गर्भधारण जैसी स्थितियाँ उनके मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक विकास को भी बुरी तरह प्रभावित करती हैं।

नवल खान ने बालिकाओं को यह भी बताया कि बाल विवाह केवल पारंपरिक प्रथा नहीं है, बल्कि यह एक दंडनीय अपराध भी है। भारत सरकार द्वारा पारित “बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006” के तहत विवाह की न्यूनतम आयु लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष निर्धारित की गई है। यदि कोई बाल विवाह करता है या उसमें सहभागिता निभाता है, जैसे पंडित, मौलवी, परिवारजन, समाज के अन्य सदस्य या यहां तक कि आयोजक—सभी को कानून के तहत सजा दी जा सकती है। इसमें छह महीने से लेकर दो साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बाल विवाह की शिकायत किस प्रकार और किन माध्यमों से की जा सकती है, जैसे कि चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098, स्थानीय थाना, बाल कल्याण समिति या बाल संरक्षण इकाई।

कार्यक्रम की विशेष बात यह रही कि इसमें संवादात्मक सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें बालिकाओं ने बाल विवाह से संबंधित अपनी जिज्ञासाओं को खुलकर साझा किया। बालिकाओं ने यह जानने की कोशिश की कि यदि परिवार बाल विवाह करने पर अड़ा हो, तो वे क्या कर सकती हैं; क्या विद्यालय के शिक्षक या प्रधानाचार्य को इसकी सूचना देना पर्याप्त होगा; और क्या सरकार द्वारा बालिकाओं के लिए ऐसी योजनाएँ हैं जो उन्हें आत्मनिर्भर बना सकें। सहायक निदेशक ने इन सभी सवालों के उत्तर विस्तार से दिए और बालिकाओं को आश्वस्त किया कि वे यदि बाल विवाह के खिलाफ खड़ी होती हैं, तो सरकार और समाज उनके साथ खड़ा होगा।

नवल खान ने यह भी बताया कि सरकार ने कई योजनाएँ चलाई हैं, जैसे कि मुख्यमंत्री राजश्री योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान, जिनका उद्देश्य बालिकाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रदान करना है। उन्होंने कहा कि शिक्षा ही वह रास्ता है, जिससे कोई भी बालिका न केवल बाल विवाह के खिलाफ खड़ी हो सकती है, बल्कि अपने पूरे जीवन को सशक्त रूप से जी सकती है। उन्होंने उपस्थित छात्राओं से अपील की कि वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने गांव, समाज और परिवार में भी इस बुराई के खिलाफ आवाज उठाएँ और अन्य बालिकाओं को भी जागरूक करें।

कार्यक्रम के अंत में बाल विवाह के विरुद्ध एक शपथ दिलवाई गई, जिसमें सभी बालिकाओं और उपस्थित शिक्षकों ने यह संकल्प लिया कि वे न तो बाल विवाह करेंगी और न ही किसी बाल विवाह को होने देंगी। यदि उन्हें कहीं भी बाल विवाह होता दिखाई देता है, तो वे उसकी सूचना अवश्य संबंधित अधिकारियों को देंगी। यह शपथ एक प्रतीकात्मक कदम था, लेकिन इसका प्रभाव दूरगामी माना जा सकता है, क्योंकि जब बालिकाएं खुद जागरूक होंगी, तभी समाज में वास्तविक बदलाव संभव होगा।

बाल विवाह को लेकर बालिकाओं को किया जागरूक
बाल विवाह को लेकर बालिकाओं को किया जागरूक

इस कार्यक्रम में कार्यवाहक प्रिंसिपल दिवाकर शर्मा, संरक्षण अधिकारी रामसहाय पारीक, विद्यालय के शिक्षक सुरेश कुमार, शिवम चौधरी समेत समस्त विद्यालय स्टाफ उपस्थित थे। इन सभी ने बालिकाओं को प्रोत्साहित किया कि वे अपनी शिक्षा पर पूरा ध्यान दें, आत्मनिर्भर बनें और किसी भी सामाजिक बुराई के आगे झुकने के बजाय, उसके खिलाफ खड़े हों।

दिवाकर शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि विद्यालय प्रशासन हमेशा छात्राओं के हितों की रक्षा के लिए तत्पर रहेगा। यदि किसी छात्रा को कभी भी ऐसी किसी स्थिति का सामना करना पड़े, तो वह निःसंकोच अपने शिक्षकों या प्रशासन से बात कर सकती है। विद्यालय न केवल उन्हें शैक्षणिक रूप से, बल्कि सामाजिक रूप से भी सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि शिक्षा वह शक्ति है, जिससे हम किसी भी रूढ़िवादिता को तोड़ सकते हैं, और बाल विवाह जैसी कुप्रथा को समाप्त कर सकते हैं।

रामसहाय पारीक ने कहा कि जब तक समाज के हर हिस्से से, खासकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों से, बाल विवाह की शिकायतें पूरी तरह से बंद नहीं होतीं, तब तक हमारा प्रयास अधूरा है। इसलिए इस अभियान का सबसे मजबूत स्तंभ वही बालिकाएं बन सकती हैं, जो स्वयं इस प्रथा से प्रभावित हो सकती थीं। उन्होंने यह भी कहा कि आज की बालिका यदि शिक्षित और जागरूक है, तो वह कल की सशक्त महिला बनेगी और समाज को सही दिशा देने में सक्षम होगी।

कार्यक्रम की समाप्ति पर विद्यालय में उत्साह और आत्मबल की एक नई ऊर्जा देखी गई। बालिकाएं जागरूकता से ओत-प्रोत दिखाई दीं और उन्होंने आपसी चर्चाओं में स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया कि अब वे इस विषय पर अधिक समझ रखती हैं और यदि कभी उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा, तो वे चुप नहीं रहेंगी। छात्राओं ने कहा कि पहले वे सोचती थीं कि यह एक पारिवारिक निर्णय होता है, लेकिन अब उन्हें पता चला है कि बाल विवाह न केवल एक सामाजिक अन्याय है, बल्कि यह कानूनन अपराध भी है।

इस प्रकार यह जागरूकता कार्यक्रम केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं था, बल्कि बालिकाओं के जीवन में ठोस परिवर्तन लाने की दिशा में एक प्रभावी कदम साबित हुआ। इसने यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया कि बाल विवाह जैसी प्रथाओं के विरुद्ध केवल कानून ही नहीं, बल्कि समाज की भागीदारी और बालिकाओं की जागरूकता भी अनिवार्य है।

यदि इस प्रकार के कार्यक्रमों को निरंतर रूप से सभी जिलों, गांवों और स्कूलों में आयोजित किया जाए, तो राजस्थान को सच में बाल विवाह मुक्त राज्य बनाने की दिशा में बड़ी सफलता मिल सकती है। इसके लिए प्रशासन, समाज और विशेष रूप से शिक्षा संस्थानों की सामूहिक भागीदारी अत्यंत आवश्यक है।

इस आयोजन ने न केवल बालिकाओं को उनके अधिकारों की जानकारी दी, बल्कि उन्हें यह आत्मविश्वास भी प्रदान किया कि वे किसी भी परिस्थिति का सामना करने में सक्षम हैं, बशर्ते उन्हें सही जानकारी, समर्थन और मार्गदर्शन मिले। इस तरह के प्रयासों से ही समाज में स्थायी और सकारात्मक बदलाव संभव है।

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