
सहरसा में कोसी नदी में डूबने से तीन वर्षीय मासूम की मौत, गांव में पसरा मातम
बिहार के सहरसा जिले से एक अत्यंत हृदयविदारक घटना सामने आई है, जिसने पूरे क्षेत्र को शोक में डुबो दिया है। यह दुखद हादसा सहरसा जिले के डेहरार थाना क्षेत्र अंतर्गत हाटी गांव, वार्ड नंबर 5 में हुआ। घटना में एक तीन वर्षीय मासूम बालक की कोसी नदी में डूबने से दर्दनाक मौत हो गई। मृतक बच्चे की पहचान दरभंगा जिले के कुशेश्वरस्थान थाना क्षेत्र के मणिकांत राम के पुत्र के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि यह बच्चा कुछ ही दिन पहले अपने नाना कोकण राम के घर आया था। उसकी मासूम मुस्कान अब केवल एक याद बनकर रह गई है।
जानकारी के अनुसार, मासूम बच्चा घर के पास ही अपने कुछ दोस्तों के साथ खेल रहा था। दिन का समय था, गांव में सामान्य दिनचर्या चल रही थी। बच्चे खेलते-खेलते नदी किनारे पहुंच गए, जहां कोसी नदी का पानी बेहद पास था। खेलते-खेलते अचानक उस मासूम का पैर फिसल गया और वह सीधे नदी के गहरे पानी में जा गिरा। देखते ही देखते वह पानी में समा गया। आसपास मौजूद बच्चों ने जब यह भयावह दृश्य देखा तो वे घबराकर दौड़ते हुए परिजनों और ग्रामीणों को सूचना देने पहुंचे।
घटना की खबर मिलते ही गांव में अफरा-तफरी मच गई। परिजन बदहवासी की हालत में नदी की ओर भागे, जहां उनका लाडला अब इस दुनिया में नहीं था। ग्रामीणों की मदद से बच्चे को नदी से बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बच्चे की सांसें थम चुकी थीं और उसकी नन्ही सी काया पूरी तरह निर्जीव हो चुकी थी। उस मासूम के चेहरे पर अब भी खेलते समय की निशानी बची हुई थी, लेकिन जीवन की डोर टूट चुकी थी।
घटना की सूचना मिलते ही डेहरार थाना पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर आवश्यक प्रक्रिया पूरी की और पोस्टमार्टम के लिए सहरसा सदर अस्पताल भेज दिया। वहीं दूसरी ओर, परिजनों का रो-रो कर बुरा हाल है। मां की चीखें और पिता की खामोशी हर किसी का दिल तोड़ देने वाली थी। एक मासूम की अकाल मृत्यु ने पूरे गांव को स्तब्ध कर दिया है। लोगों की आंखों में आंसू हैं और दिलों में गहरी वेदना।
स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि कोसी नदी के किनारे कोई सुरक्षा उपाय नहीं हैं। गांव के बच्चे अक्सर इस क्षेत्र में खेलने आते हैं, लेकिन सुरक्षा के अभाव में इस तरह की घटनाएं हो जाती हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि नदी किनारे सुरक्षा दीवार बनाई जाए या कम से कम चेतावनी बोर्ड और बैरिकेडिंग लगाई जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
इस त्रासदी ने एक बार फिर उस सामाजिक लापरवाही को उजागर कर दिया है, जो गांवों में खुले जल स्रोतों के आसपास देखी जाती है। नदियों, तालाबों और गड्ढों के किनारे पर न तो कोई चेतावनी बोर्ड होता है और न ही कोई रोकथाम की व्यवस्था। बच्चे अपनी मासूमियत में ऐसे स्थानों पर खेलते रहते हैं, और कभी-कभी यह खेल उनके जीवन की अंतिम क्रिया बन जाती है।

इस घटना के बाद गांव में मातम का माहौल है। कोई कुछ बोल नहीं पा रहा। हर आंख नम है और हर दिल इस हादसे से द्रवित है। बच्चे की मौत ने न केवल उसके परिवार को तोड़ा है, बल्कि पूरे गांव को झकझोर कर रख दिया है। लोग इस दुख की घड़ी में परिवार को ढांढस बंधाने पहुंच रहे हैं, लेकिन कोई भी शब्द उस पीड़ा को कम नहीं कर पा रहा जो मणिकांत राम और उसके परिवार पर टूटी है।
पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और आगे की जांच की प्रक्रिया जारी है। हालांकि यह एक स्पष्ट दुर्घटना है, लेकिन प्रशासन इस घटना से सबक लेकर भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए, यही अपेक्षा की जा रही है।
बिहार में हर वर्ष मॉनसून के दौरान नदियों और जल स्रोतों के किनारे इस तरह की घटनाएं देखने को मिलती हैं। खासकर कोसी नदी, जो ‘बिहार की शोक’ कही जाती है, अपने विकराल स्वरूप और अनियमित प्रवाह के लिए कुख्यात है। ऐसे में नदी किनारे रहने वाले ग्रामीणों के लिए विशेष सतर्कता की आवश्यकता होती है। प्रशासन को चाहिए कि संवेदनशील इलाकों में जागरूकता अभियान चलाए जाएं, बच्चों के लिए सुरक्षित खेल स्थल बनाए जाएं और नदी किनारे उचित सुरक्षा व्यवस्था की जाए।
तीन साल की नन्ही सी जान, जिसने अभी दुनिया देखनी शुरू ही की थी, यूं अचानक इस दुनिया को अलविदा कह देगी, किसी ने सोचा भी नहीं था। उसकी तोतली बातें, उसकी मासूम शरारतें और उसकी मुस्कुराहट अब सिर्फ यादों में रह गई हैं। यह केवल एक परिवार का नुकसान नहीं है, यह पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है कि अब और मासूम जानें न जाएं।
इस हृदयविदारक घटना के बाद प्रशासन, समाज और हर व्यक्ति को यह सोचने की जरूरत है कि क्या हम अपने बच्चों के लिए एक सुरक्षित वातावरण दे पा रहे हैं? अगर नहीं, तो फिर इस मासूम की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक असफलता है।

