
जयपुर/मुंडावर। विधानसभा के बजट सत्र के दौरान मुंडावर विधायक ललित यादव ने किसानों की बदहाली का मुद्दा बेहद प्रखरता से उठाया। सदन में सरकार को आईना दिखाते हुए यादव ने कहा कि जिस किसान को पूर्व प्रधानमंत्रियों ने राष्ट्र की ‘रीढ़’ बताया था, आज वही किसान व्यवस्था की मार झेलते हुए अपनी जीविका बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। “खेतीइबादत नहीं, अब कठिन परीक्षा बन गई है” विधायक ने भावुक और तीखे लहजे में कहा कि प्राकृतिक आपदा और अतिवृष्टि से जब फसलें बर्बाद होती हैं, तो मिलने वाला मुआवजा ऊंट के मुंह में जीरे के समान होता है। उन्होंने जोर देकर कहा, “जो राहत दी जाती है, वह बीज और बिजली के खर्च तक की भरपाई नहीं कर पाती। मुआवजे की राशि इतनी हो कि किसान कम से कम अगली बुवाई के लिए खड़ा हो सके।”
खाद की किल्लत और नकली बीज पर प्रहार
ललित यादव ने डीएपी और यूरिया की कमी पर सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि जब किसान को खाद की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब उन्हें लंबी कतारों में लाठियां खानी पड़ीं। हालांकि, उन्होंने नकली खाद-बीज माफियाओं पर कार्रवाई का स्वागत किया, लेकिन मांग की कि दोषियों को ऐसी सजा मिले जो नजीर बन जाए।

प्याज का दर्द और MSP की मांग
अलवर क्षेत्र का हवाला देते हुए विधायक ने बताया कि कैसे हजारों टन प्याज समर्थन मूल्य के अभाव में बर्बाद हो गया। उन्होंने मांग की कि केवल अनाज ही नहीं, बल्कि सब्जी फसलों पर भी एमएसपी (MSP) लागू होनी चाहिए ताकि किसानों को मंडियों के रहमोकरम पर न छोड़ना पड़े।
रात की बिजली और आयात शुल्क पर चिंता
बिजली संकट: “किसान को कड़कती ठंड और रात के अंधेरे में खेतों में क्यों भेजा जा रहा है?” यादव ने मांग की कि किसानों को दिन में पर्याप्त और नियमित बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
आयात नीति: उन्होंने कृषि उत्पादों के आयात शुल्क में कमी पर चिंता जताते हुए कहा कि गेहूं, मक्का और दुग्ध उत्पादों के आयात से स्थानीय किसानों की कमर टूट जाएगी।
“किसान बचेगा तो खेत बचेंगे”
सदन में अपनी बात को विराम देते हुए ललित यादव ने एक बड़ा संदेश दिया— “अगर किसान बचेगा, तभी खेत बचेंगे और तभी यह देश मजबूत होगा।” उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि घोषणाओं से ऊपर उठकर धरातल पर ठोस नीतिगत निर्णय लिए जाएं।

