
लखनऊ, 21 सितंबर 2025 — उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज के ट्रामा सेंटर में शनिवार देर रात एक चौंकाने वाली घटना सामने आई, जहाँ मेडिकल स्टूडेंट्स द्वारा एक नर्सिंग ऑफिसर पर जानलेवा हमला किए जाने का आरोप लगा है। इस घटना ने पूरे चिकित्सा समुदाय को हिला कर रख दिया है और स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
शराब के नशे में थे मेडिकल स्टूडेंट्स
प्रत्यक्षदर्शियों और अस्पताल के स्टाफ के अनुसार, यह घटना शनिवार देर रात लगभग 11:30 बजे की है। ट्रामा सेंटर के ऑर्थो ओटी (ऑर्थोपेडिक ऑपरेशन थिएटर) में ड्यूटी पर तैनात नर्सिंग ऑफिसर शुभम पर मेडिकल कॉलेज के जूनियर रेजिडेंट्स (JR-1 और JR-2) ने अचानक हमला कर दिया। बताया जा रहा है कि हमले के वक्त आरोपी रेजिडेंट डॉक्टर्स शराब के नशे में थे।
चश्मदीदों के मुताबिक, पहले नर्सिंग ऑफिसर शुभम के साथ गाली-गलौज की गई और जब उन्होंने इसका विरोध किया तो स्टूडेंट्स ने उन्हें पीटना शुरू कर दिया। शुभम को गंभीर चोटें आई हैं और तत्काल उन्हें मेडिकल सहायता दी गई।
पुरानी रंजिश बनी हमले की वजह
प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि शुभम और आरोपी रेजिडेंट डॉक्टर्स के बीच कुछ दिन पहले किसी मुद्दे को लेकर बहस हुई थी। यह बहस इतनी तीव्र थी कि माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया था। उसी का बदला लेने के इरादे से शनिवार रात को यह हमला किया गया।
सूत्रों के अनुसार, आरोपी रेजिडेंट्स ने शुभम को अकेला पाकर ऑर्थो ओटी में घुसकर उन्हें बुरी तरह पीटा। यह पूरी घटना ट्रामा सेंटर की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाती है, क्योंकि इतनी संवेदनशील जगह पर इस तरह की हिंसात्मक घटना का होना बेहद चिंताजनक है।
नर्सिंग ऑफिसर ने दी लिखित शिकायत
हमले के तुरंत बाद घायल शुभम ने ट्रामा सेंटर चौकी पर लिखित शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में शुभम ने मेडिकल स्टूडेंट्स द्वारा मारपीट, गाली-गलौज, और जान से मारने की धमकी देने की बात कही है। पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
पुलिस का कहना है कि CCTV फुटेज खंगाले जा रहे हैं और मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार है, जिसके आधार पर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
अस्पताल प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
इस पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि अस्पताल प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। घटना के कई घंटे बाद भी कोई वरिष्ठ अधिकारी मीडिया के सामने नहीं आया और न ही कोई आंतरिक जांच की घोषणा की गई।
स्वास्थ्य कर्मियों और नर्सिंग स्टाफ का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब जूनियर डॉक्टर्स ने इस तरह का व्यवहार किया हो। अक्सर नर्सिंग स्टाफ को बदसलूकी और दबाव का सामना करना पड़ता है, लेकिन इस बार मामला हाथापाई और जानलेवा हमले तक पहुँच गया।

नर्सिंग यूनियन में आक्रोश, हड़ताल की चेतावनी
इस घटना के बाद नर्सिंग यूनियन ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। यूनियन के अध्यक्ष ने बयान जारी कर कहा, “हम इस अमानवीय हमले की कड़ी निंदा करते हैं। मेडिकल स्टाफ की सुरक्षा को लेकर हम लंबे समय से मांग कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन हर बार इसे नजरअंदाज करता रहा है।”
यूनियन ने चेतावनी दी है कि अगर दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई और भविष्य में ऐसे मामलों से निपटने के लिए ठोस नीति नहीं बनाई गई, तो वे कार्य बहिष्कार पर जा सकते हैं। यूनियन ने यह भी मांग की है कि सभी अस्पतालों में कार्यरत कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और CCTV कैमरों की संख्या और निगरानी को बढ़ाया जाए।
चिकित्सा समुदाय में गुस्सा और चिंता
इस घटना ने मेडिकल कॉलेज के अन्य स्टाफ में भी गहरी नाराजगी और चिंता पैदा कर दी है। डॉक्टर, नर्स, तकनीशियन और अन्य कर्मचारियों का कहना है कि अगर अस्पताल में ही सुरक्षाकर्मी और प्रशासन हमारी रक्षा नहीं कर सकते, तो हम कैसे निर्भय होकर मरीजों की सेवा करेंगे?कई डॉक्टरों और वरिष्ठ नर्सों ने इस मुद्दे पर खुलकर कहा कि ट्रेनी डॉक्टर्स का व्यवहार पिछले कुछ सालों में काफी बदल गया है। कई बार वे खुद को ‘अधिकार संपन्न’ समझकर बाकी स्टाफ के साथ दुर्व्यवहार करते हैं। इस घटना ने चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और अनुशासन पर भी सवाल खड़े किए हैं।
क्या कहते हैं कानून और नियम?
सरकारी अस्पतालों और मेडिकल संस्थानों में कार्यरत कर्मियों की सुरक्षा को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के दिशा-निर्देश पहले से मौजूद हैं। ‘हॉस्पिटल प्रोटेक्शन एक्ट’ जैसे कानून कई राज्यों में लागू हैं, लेकिन इनका क्रियान्वयन कमजोर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल संस्थानों को अपने आंतरिक अनुशासन तंत्र को मज़बूत करने की आवश्यकता है। साथ ही ऐसे मामलों में ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनानी चाहिए ताकि भविष्य में कोई ऐसी घटना दोबारा न हो।
समाज और सरकार की भूमिका
इस तरह की घटनाएँ केवल एक कर्मचारी या एक विभाग की समस्या नहीं होती, यह पूरे समाज की संवेदनशीलता, हमारी संस्थाओं की जवाबदेही और शासन की तत्परता की परीक्षा होती हैं। जब अस्पताल जैसी जगहों पर भी लोग सुरक्षित नहीं हैं, तो यह सरकार और प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी होनी चाहिए।
सरकार को चाहिए कि वह जल्द से जल्द एक स्वतंत्र जांच समिति गठित करे जो इस मामले की निष्पक्षता से जांच कर सके और दोषियों को सजा दिला सके।
निष्कर्ष:
लखनऊ के मेडिकल कॉलेज के ट्रामा सेंटर में हुए इस हमले ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा को लेकर हमारे संस्थान और प्रशासन कितने लापरवाह हैं। जब नर्सिंग ऑफिसर जैसी अहम कड़ी पर ही हमला हो सकता है, तो सामान्य मरीजों और उनके तीमारदारों की सुरक्षा की कल्पना करना भी कठिन है।
अब आवश्यकता है कि प्रशासन, सरकार, और समाज तीनों इस मुद्दे को गंभीरता से लें और स्वास्थ्य संस्थानों को एक सुरक्षित, अनुशासित और सम्मानजनक कार्यस्थल बनाने के लिए मिलकर काम करें।

