
सत्येंद्र शुक्ला जयपुर । भजनलाल सरकार ने चित्तौडगढ़ की मेवाड़ यूनिवर्सिटी को फर्जी डिग्री जारी करने और अन्य अनियमितताओं को लेकर परिसमापन की कार्रवाई के लिए कारण बताओं नोटिस जारी किया है । मेवाड़ यूनिवर्सिटी को 45 दिनों के अंदर नोटिस का बिंदुवार जवाब देना पड़ेगा । आपको बता दे कि यूनिवर्सिटी के अधिनियम 2009 की धारा 44(1) की उपधारा 2 और 3 के तहत संभागीय आयुक्त उदयपुर के संयोजन में 7 अप्रैल 2024 और 4 सितंबर 2025 को जांच समिति गठित की गई थी । इस समिति की तरफ से की गई जांच में विश्वविद्यालय में अग्रलिखित अनिमितताएं पाई गई है ।
1. जांच समिति के जांच के मुताबिक मेवाड़ विश्वविद्यालय, चित्तौड़गढ़ में प्रवेश से लेकर परीक्षा परिणाम तक दत्तावेजों का नियमानुसार संधारण नहीं किया जा रहा है।
2. विश्वविद्यालय द्वारा DAESI डिप्लोमा कोर्स में वर्ष पर्यन्त तक प्रवेश दिया जा रहा है एवं नियम विरुद्ध परीक्षा में बैठाया जा रहा है।
3. DAESI पाठ्यक्रम की जांच में पाया गया कि छात्रों को परीक्षा आयोजन के पश्चात् भी प्रवेश दिया जाकर उपाधियां प्रदान किये जाने का अपराध किया जा रहा है।
4. DAESI पाठ्यक्रम के संचालन में विश्वविद्यालय द्वारा ना केवल National Institute of Agriculture Extension Management (MANAGE) के दिशा निर्देशों का उल्लघंन किया गया बल्कि विश्वविद्यालय के अकादमिक परिषद के निर्णय को दरकिनार करते हुए, DAESI पाठ्यक्रम का संचालन किया जाकर छात्रों को प्रमाण पत्र जारी किये गये हैं जो कि MANAGE व राज्य सरकार की नोडल एजेन्सी SAMETI के प्रावधानों का स्पष्टतः उल्लघंन है। साथ ही MANAGE व SAMETI के दिशा निर्देशों का उल्लघंन करते हुए क्षमता से कई अधिक विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम में प्रवेश दिया गया है, जिनकी संख्या क्षमता से कई अधिक पाई गई।
5. पाठ्यक्रम संचालन में भी दिशा निर्देशों की अवहेलना करते हुए ना तो निर्धारित बेच बनाये गए ना ही सभी छात्रों के Classroom Session व Field Visit करवाये गये।
6. जांच समिति द्वारा DAESI पाठ्यक्रम के संबंध में विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराये गये दस्तावेजों एवं भौतिक निरीक्षण के अनुसार विश्वविद्यालय द्वारा DAESI पाठ्यक्रम के संचालन एवं प्रमाण पत्र दिये जाने में अनियमितताएं पाई गई।
7. समिति द्वारा जांच में पाया कि विश्वविद्यालय द्वारा विद्यार्थियों से DAESI पाठ्यक्रम के लिए निर्धारित शुल्क रुपये 28000/- के स्थान पर अलग अलग शुल्क वसूल किया जा रहा है।
8. जांच में पाया गया कि विश्वविद्यालय द्वारा नियमों की अवहेलना करते हुए पाठ्यक्रम संचालित किया गया।
9. बी.एस.सी कृषि पाठ्यक्रम संचालन के लिए ICAR, उच्च शिक्षा विभाग व कृषि विभाग द्वारा निर्धारित मापदण्डों की पूर्ति एवं ICAR से Accreditation प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा आवेदन नहीं करने तथा शैक्षणिक स्टाफ के पास निर्धारित योग्यता न होना, सिंचित भूमि, कृषि फार्म जैत्ती आवश्यक मापदण्डों की पूर्ति में प्रथम दृष्टया कमियां पाई गई।
10. मेवाड़ विश्वविद्यालय के जांच एवं प्राप्त दस्तावेजों के अवलोकन से समिति ने पाया कि विश्वविद्यालय के प्रशासनिक अधिकारी प्रो. पी. रामैया, प्रो. वी.एन.आर. पिल्लई, प्रो. वी.के. वैद्य, प्रो. कौशल किशोर चन्दुल, प्रो. के.एस. राना, प्रो. आलोक मिश्रा प्रेसीडेन्ट पद पर कार्यरत थे।

एम. सुदर्शनम, प्रो. गोविन्द सिंह चारण, प्रो. वेंकट वी.पी.आर.पी., बी.एल. स्वर्णकार, लक्ष्मण सिंह रावत, आर. रामास्वामी, डॉ. मायाधर बरीक कुलसचिव पद पर कार्यरत थे। जिनके द्वारा शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्तियों में विश्वविद्यालय के अधिनियम / परिनियम एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मापदण्डों का उल्लंघन किया गया है तथा वर्तमान में भी किया जा रहा है। विश्वविद्यालय के अधिकारियों को नियम विरुद्ध उनके कार्य के अतिरिक्त उच्चस्थ पद का अतिरिक्त कार्यभार लम्बे समय तक सुपुर्द किया गया। जिसके परिणामस्वरूप विश्वविद्यालय में उक्त अधिकारियों द्वारा गोपनीय दस्तावेजों एवं रिकॉर्ड का उचित संधारण नहीं किया था। परीक्षा अनुभाग से जुड़े डॉ. सैयद असगर मेंहदी, प्रियंका गौतम, अशोक खरोदिया, डॉ. ओम प्रकाश गुप्ता, सुशील शर्मा, परीक्षा नियंत्रक पद पर कार्यरत थे। इन अधिकारी/कर्मचारी की फर्जी उपाधियों के वितरण में भूमिका पाई गई। एसओजी द्वारा उक्त कृत्यों में लिप्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों की गिरफ्तारियां भी की गई जो वर्तमान में न्यायिक अभिरक्षा में हैं।
11. विश्वविद्यालय प्रशासन एम. सुदर्शनम, गोविन्द सिंह चारण, प्रो. वेंकट वी.पी.आर.पी., बी.एल. स्वर्णकार, लक्ष्मण सिंह रावत, आर. रामास्वामी, डॉ. मायाधर बरीक कुल सचिव द्वारा परीक्षा नियंत्रक जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त अधिकारियों की नियुक्ति में नियमों की अवहेलना करते हुए पदस्थापित परीक्षा नियंत्रक सैयद असगर अली के स्थान पर अन्य कौशल किशोर चन्दुल, यथा उप-परीक्षा नियंत्रक इत्यादि को परीक्षा नियंत्रक का अतिरिक्त कार्य सुपुर्द किया गया था। इनसे परीक्षा का आयोजन एवं उपाधियों के प्रकाशन जैसा अति संवेदनशील कार्य करवाया गया था।
12. विश्वविद्यालाय के एम. सुदर्शनम, गोविन्द सिंह चारण, प्रो. वेंकट वी.पी.आर.पी,बी.एल. स्वर्णकार, लक्ष्मण सिंह रावत, आर. रामास्वामी, डॉ. मायाधर बरीक कुलसचिव जैसे अधिकारियों से उपाधियां प्रकाशन से पूर्व अनुमति नहीं लेकर डिग्रियां छापने का गलत कार्य गोपनीय विभाग के अधिकारियों डॉ. सैयद असगर मेंहदी, प्रियंका गौतम, अशोक खरोदिया, डॉ. ओम प्रकाश गुप्ता, सुशील शर्मा द्वारा किया गया था। विश्वविद्यालय प्रशसन द्वारा गोपनीय शाखा में कार्यरत अधिकारियों के कार्यों का समय-समय पर पर्यवेक्षण नहीं किया गया था। जिसके कारण फर्जी डिग्री प्रकरण हुआ। अतः फर्जी डिग्री कार्य में उपरोक्त अधिकारी एवं कुलसचिव स्तर के अधिकारियों पर संदेह की सुई जाती है।
13. विश्वविद्यालय में शोध विभाग में नियमों के विरुद्ध 425 पीएचडी शोध उपाधियां प्रदान की गई। जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियम विरुद्ध है। विश्वविद्यालय BOM द्वारा शोध छात्रों की शोध समयावधि बढ़ाने का पत्र जारी नहीं किया गया था, फिर भी प्रो प्रेसीडेन्ट प्रो. सर्वोत्तम दीक्षित एवं शोध डायरेक्टर डॉ. चेताली अग्रवाल द्वारा पीएचडी उपाधियां प्रदान की जा रही हैं। उपर्युक्त तथ्यों के अवलोकन से प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि विश्वविद्यालय अपने अधिनियम के प्रावधानों व यूजीसी व अन्य विनियामक निकायों के नियमों, विनियमों, मानकों इत्यादि का पूर्णतया पालन नहीं कर रहा है।
अतः निर्देशानुसार मेवाड़ विश्वविद्यालय, चित्तौड़गढ़ अधिनियम, 2009 (2009 का अधिनियम संख्या 4) की धारा 44 (1) के अन्तर्गत यह कारण बताओ नोटिस जारी कर लेख है कि नोटिस का बिन्दुवार जवाब 45 दिवस की अवधि में राज्य सरकार को प्रस्तुत करें कि मेवाड़ विश्वविद्यालय, चित्तौड़गढ़ के प्रावधानों का उल्लंघन करने तथा विश्वविद्यालय में व्याप्त कुप्रशासन/अनियमितताओं की स्थिति के कारण विश्वविद्यालय के परिसमापन आदेश क्यों न जारी कर दिये जायें।

