दौसा में 13 सितंबर को तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन

दौसा में 13 सितंबर को तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन

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दौसा

आगामी 13 सितंबर 2025 को दूसरी जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) की अगुवाई में दौसा में तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन किया जाना निश्चित है, जिसका उद्देश्य राजीनामा योग्य मामलों का आपसी समझौते पर आधारित निपटारा सुनिश्चित करना है। इसकी तैयारियों की समीक्षा और दिशा-निर्देश हेतु हाल ही में एक विस्तृत बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता जिला एवं सत्र न्यायाधीश और DLSA अध्यक्ष हुकम सिंह राजपुरोहित ने की।

मोहापौर संतोष अग्रवाल (DLSA सचिव) ने बताया कि बैठक में सभी न्यायिक अधिकारियों को आदेशित किया गया कि वे राजीनामा योग्य मामलों की पहचान करें और पक्षकारों के बीच प्री-काउंसलिंग एवं समझौता वार्ता आयोजित करवा कर निष्पादन सुनिश्चित करें। विशेष रूप से धारा 138 NI एक्ट (चेक बाउंस) एवं धन वसूली मामलों को प्रमुखता दी गई। बैठक में न्यायिक अधिकारियों—प्रेम राजेश, रेखा राठौड़, बृजेश कुमार, रविकांत सोनी, उमेश वीर, सीमा करोल, रविकांत मीना, अंकिता दायमा, कविता मीना, रचना बालोत, पुलकित शर्मा आदि—की उपस्थिति रही।


लोक अदालत: न्याय की तेज और सस्ती रास्ता

लोक अदालत एक ऐसा वैकल्पिक विवाद निपटान मंच है जहाँ अदालतों में लंबित या मुकदमेबाजी शुरू होने से पहले (pre-litigation) के मामलों को आपसी समझौते से हल किया जाता है। यह व्यवस्था Legal Services Authorities Act, 1987 के तहत राष्ट्रीय स्तर पर लागू की गई है। इससे प्राप्त लाभों में शामिल हैं:

  • न्याय प्रक्रिया में व्यय और समय की बचत, क्योंकि सुनवाई सामान्य न्यायालयों की अपेक्षा तेज और सरल होती है।
  • कोर्ट फीस वापस प्राप्त हो सकती है यदि मामला लोक अदालत में समझौते पर निपट जाता है।
  • फैसले अंतिम और बाध्यकारी होते हैं, जिन्हें सामान्य अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती ।

इन सुविधाओं के कारण लोक अदालत आम जनता में न्याय की पहुंच को सरल, किफायती और प्रभावी बनाती है।


दौसा में लोक अदालत का प्रसंग

दौसा में इस लोक अदालत आयोजन से पहले की गई तैयारियों का अभिप्रेत उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अधिकांश राजीनामा योग्य मुकदमे, विशेषकर चेक बाउंस व मनी रिकवरी, समय रहते समाधानित हों। प्रारंभिक पहचान (pre-identification) और प्री-काउंसलिंग इस प्रक्रिया की रीढ़ है, ताकि मुद्दों के पक्षकार समझौते के लिए प्रेरित हो सकें। यह प्रक्रिया लोक अदालत में सुनवाई से पहले भी अपनाई जा रही है, जैसा कि अन्य जिलों में होता आया है।

उदाहरण स्वरूप, 2023 में दौसा में आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत में 13,467 प्रकरणों को समझौता वार्ता के लिए चिन्हित किया गया था, जिनमें लंबित और प्रिलिटिगेशन दोनों प्रकार के विवाद शामिल थे। इसी तरह, अन्य राज्यों जैसे गुजरात, पंजाब (पटियाला), बिहार (पूर्णिया) में भी 13 सितंबर को राष्ट्रीय लोक अदालत के आयोजन की तैयारियाँ चल रही हैं, जिनमें चेक बाउंस, मनी रिकवरी, MACT, श्रम विवाद और अन्य सिविल एवं क्रिमिनल कंपाउंडेबल मामलों को प्राथमिकता दी जा रही है

दौसा में 13 सितंबर को तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन
दौसा में 13 सितंबर को तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन

बैठक की भूमिका और रणनीतियाँ

दौसा की बैठक में निदर्शित मुख्य बिंदु थे:

  • राजीनामा योग्य मामलों की पहचान — प्राथमिकता के आधार पर ज़्यादा से ज़्यादा प्रकरणों को लोक अदालत में लाना।
  • प्री-काउंसलिंग — पक्षकारों के बीच वार्ता करवा कर आपसी समझौते की संभावनाएँ बढ़ाना।
  • स्थानीय न्यायिक अधिकारियों और DLSA का समन्वय — बैठक में उपस्थित प्रेम राजेश, रेखा राठौड़ सहित अन्य न्यायिक अधिकारी इस कार्य में अहम भूमिका निभाएंगे।
  • धारा 138 NI एक्ट और धन वसूली मामलों को विशेष महत्व — क्योंकि ये अक्सर राजीनामा योग्य और समझौते की संभावना रखने वाले प्रकरण होते हैं।

इन रणनीतियों से न केवल मामले सुचारू रूप से निपटेंगे, बल्कि न्याय का लाभ आम जनता तक पहुंचने में और तेजी आएगी।


उम्मीद और सकारात्मक प्रभाव

इस लोक अदालत आयोजन से संभवतः निम्नलिखित सकारात्मक परिणाम प्राप्त हो सकते हैं:

  • अदालतों पर फैलता बोझ कम होगा, क्योंकि कई मामले समझौते से निपट जाएंगे।
  • न्याय उपलब्धता में वृद्धि — लोग समय और खर्च की बचत के साथ न्याय पा सकेंगे।
  • स्थानीय न्याय तंत्र में विश्वास बढ़ेगा, क्योंकि संवेदनशील और निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
  • निकटता और किफ़ायती व्यवस्था : लोक अदालत ज़्यादा करीब, तेज और कम शुल्क वाली व्यवस्था होती है।

निष्कर्ष

दौसा में तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन एक महत्वपूर्ण पहल है, जो न्याय तंत्र को सरल, न्यायसंगत और अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में एक ठोस कदम है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा राजीनामा योग्य मामलों की पहचान, प्री-काउंसलिंग, और लोक अदालत के benches की स्थापना की तैयारियों से यह स्पष्ट होता है कि प्रशासन न्याय के मार्ग को संक्षिप्त और प्रभावी बनाना चाहता है।

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