उपराष्ट्रपति चुनाव : BJP ने शिवसेना-UBT और NCP-शरद गुट से मांगा समर्थन, फडणवीस ने ठाकरे-पवार से की बातचीत

उपराष्ट्रपति चुनाव : BJP ने शिवसेना-UBT और NCP-शरद गुट से मांगा समर्थन, फडणवीस ने ठाकरे-पवार से की बातचीत

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1. उपराष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी ने मांगा समर्थन

मुंबई में आगामी उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियाँ तेज़ हो गई हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस बार एक खास रणनीति के तहत विपक्षी दलों से भी समर्थन की मांग की है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जानकारी दी कि उन्होंने राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टियों—शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (शरद पवार गुट)—से एनडीए के उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन के लिए समर्थन मांगा है।

सीएम फडणवीस ने बताया कि उपराष्ट्रपति का चुनाव गैर-पक्षपातपूर्ण होता है, जहां किसी भी दल पर व्हीप लागू नहीं होता। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने उद्धव ठाकरे और शरद पवार से व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर समर्थन का अनुरोध किया। उन्होंने कहा, “सीपी राधाकृष्णन महाराष्ट्र के राज्यपाल भी हैं और मुंबई के मतदाता भी। इसलिए मैंने विपक्ष से इस चुनाव में गैर-पक्षपात के आधार पर समर्थन की अपील की है।”

2. उद्धव और पवार की प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री फडणवीस द्वारा किए गए इस प्रयास पर शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (शरद पवार गुट) की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग रहीं। उद्धव ठाकरे ने समर्थन को लेकर तत्काल कोई निर्णय नहीं लिया, बल्कि कहा कि वे इस विषय में अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से चर्चा करेंगे और उसके बाद ही कोई निर्णय लेंगे। इससे यह संकेत मिलता है कि शिवसेना-यूबीटी अभी इस मुद्दे पर अपने पत्ते खोलने को तैयार नहीं है और वह रणनीतिक दृष्टि से सोच-विचार कर रही है।

दूसरी ओर, एनसीपी नेता शरद पवार ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि चूंकि विपक्ष ने अपना उम्मीदवार खड़ा किया है, इसलिए वे विपक्षी दलों के साथ रहेंगे। शरद पवार के इस बयान से यह स्पष्ट हो गया कि एनसीपी (शरद गुट) भाजपा के उम्मीदवार का समर्थन नहीं करेगी। इससे यह भी झलकता है कि विपक्ष अपनी एकता बनाए रखना चाहता है, विशेषकर राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे चुनावों में।

3. पृथ्वीराज चव्हाण पर मतदाता सूची विवाद

इस राजनीतिक हलचल के बीच, एक अन्य बड़ा मुद्दा सामने आया—पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से जुड़ा मतदाता सूची विवाद। देवेंद्र फडणवीस ने इस मामले में कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि विधायक अतुल भोसले ने पृथ्वीराज चव्हाण के निजी सहायक गजानन अवलकर और उनके परिवार से जुड़ी जानकारी साझा की है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे मतदाता सूची में दो जगहों पर पंजीकृत हैं।

सीएम फडणवीस ने तीखा हमला करते हुए कहा, “राहुल गांधी ने वोट चोरी का ठेका ले लिया है। अब साफ हो गया है कि असली वोट चोर कौन है।” इस बयान से राज्य की राजनीति में नया बवाल खड़ा हो गया है। यदि ये आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह कांग्रेस के लिए गंभीर संकट का कारण बन सकते हैं। हालांकि, कांग्रेस की ओर से इस पर तत्काल कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन संभावना है कि इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी और तेज़ होगी।

4. महिला आयोग के कार्यक्रम में हुई भागीदारी

राजनीतिक मामलों के अलावा, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सामाजिक मुद्दों पर भी सक्रिय भागीदारी दिखाई। हाल ही में वे राष्ट्रीय महिला आयोग के एक कार्यक्रम में शामिल हुए, जो महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग के सहयोग से आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम का उद्देश्य राज्य महिला आयोगों के साथ संवाद स्थापित करना और उनकी क्षमता निर्माण करना था।

इस बैठक की थीम थी—‘शक्ति संवाद: इंटरैक्टिव एंड कैपेसिटी बिल्डिंग मीटिंग विद स्टेट वूमन कमिशन्स’। इसमें महिला सशक्तिकरण, कानूनी जागरूकता, और महिला आयोगों की कार्यक्षमता को बढ़ाने पर गहन चर्चा की गई। इस अवसर पर विधान परिषद के सभापति राम शिंदे, विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा विजया रहाटकर, विधान परिषद की उपसभापति नीलम गोरे, और महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा रुपाली चाकणकर समेत कई प्रमुख हस्तियाँ उपस्थित थीं।

यह कार्यक्रम महिला सशक्तिकरण के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण माना गया, जहां राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर महिला आयोगों के बीच सहयोग बढ़ाने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए। मुख्यमंत्री फडणवीस ने महिलाओं की सुरक्षा और समान अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई।


निष्कर्ष:
महाराष्ट्र में उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर भाजपा की ओर से किए गए प्रयास राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। विपक्ष से समर्थन मांगना भाजपा की एक नई रणनीति हो सकती है, जिससे उन्हें व्यापक जनसमर्थन मिले। वहीं, मतदाता सूची विवाद ने राजनीतिक गरमी को और बढ़ा दिया है। दूसरी ओर, महिला सशक्तिकरण जैसे सामाजिक मुद्दों पर सरकार की भागीदारी सकारात्मक संकेत देती है कि राजनीति केवल सत्ता की नहीं, बल्कि समाजसेवा की भी दिशा में आगे बढ़ रही है।

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