
बयाना उपखंड के अड्डा गाँव में स्थित
आंगनबाड़ी केंद्र:- की जर्जर स्थिति को लेकर ग्रामीणों में भारी रोष और चिंता का माहौल है। हाल ही में देशभर में विभिन्न स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में हुए हादसों के मद्देनज़र स्थानीय अभिभावकों की चिंता और भी बढ़ गई है। इसी कड़ी में अड्डा गाँव का यह आंगनबाड़ी केंद्र अब गंभीर समस्या बन गया है, जहाँ छोटे-छोटे मासूम बच्चों की जान खतरे में है। यह भवन राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय अड्डा की चारदीवारी के भीतर स्थित है, लेकिन उसकी हालत इतनी खराब है कि कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। दीवारों में दरारें हैं, छत झुक चुकी है, प्लास्टर झड़ रहा है और बरसात के समय भवन की स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह भवन वर्षों पुराना है और मरम्मत के नाम पर कभी कोई गंभीर कार्य नहीं हुआ। अब हालत यह हो चुकी है कि भवन पूरी तरह से ढहने की कगार पर है। साहब सिंह गुर्जर, अतरूप सिंह गोठिया, प्यार सिंह गवैया, लखन सिंह पटेल और अतरूप सिंह ठेकेदार सहित गाँव के कई जागरूक नागरिकों ने इस विषय में एकजुट होकर जिला प्रशासन और बाल विकास विभाग से तत्काल हस्तक्षेप की माँग की है। उन्होंने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि यदि इस खतरनाक भवन को तुरंत नहीं गिराया गया और नया भवन नहीं बनाया गया, तो वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल भेजना बंद कर देंगे। यह चेतावनी एक तरह से ग्रामीणों की हताशा और गुस्से का प्रतीक है, जो प्रशासन की निष्क्रियता को इंगित करता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि बाल विकास विभाग को कई बार लिखित और मौखिक रूप से इस विषय में अवगत कराया गया, लेकिन विभाग ने कभी भी इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया। हर बार सिर्फ आश्वासन दिया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इस लापरवाही का खामियाजा बच्चों और उनके परिवारों को उठाना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वे अपने बच्चों को शिक्षा से वंचित नहीं करना चाहते, लेकिन उन्हें उनकी जान से भी ज्यादा कुछ नहीं प्यारा। ऐसी परिस्थिति में यदि बच्चे किसी दुर्घटना के शिकार होते हैं, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन और संबंधित विभाग की होगी।
यह भी गौर करने लायक बात है कि बाल विकास विभाग, जिसका उद्देश्य बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और सुरक्षा की व्यवस्था करना है, वह स्वयं बच्चों की सुरक्षा के प्रति इस तरह की उदासीनता दिखा रहा है। यह न केवल उनकी कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि सरकारी सिस्टम में व्याप्त लापरवाही और अकर्मण्यता को भी उजागर करता है। बच्चों की सुरक्षा कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक मानवीय विषय है और इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

ग्रामीणों ने यह भी बताया कि आंगनबाड़ी केंद्र में केवल भवन ही नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं की भी भारी कमी है। शुद्ध पेयजल, शौचालय, बिजली और साफ-सफाई जैसी आवश्यक सुविधाओं का अभाव है। ऐसे में न केवल बच्चे असुरक्षित महसूस करते हैं, बल्कि उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से भी नुकसान हो रहा है। कई अभिभावकों ने तो यह तक कहना शुरू कर दिया है कि यदि निजी संसाधनों से शिक्षा उपलब्ध कराना पड़े, तो वे उसका प्रयास करेंगे, लेकिन ऐसी खतरनाक जगह पर अपने बच्चों को भेजना अब उनके बस की बात नहीं है।
समस्या केवल एक गाँव की नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यशैली का आईना है। अगर समय रहते प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया, तो ऐसी घटनाएं अन्य गाँवों में भी सामने आ सकती हैं। और तब प्रशासन को न केवल जवाबदेही निभानी होगी, बल्कि जनआक्रोश का भी सामना करना पड़ेगा। बच्चों की सुरक्षा कोई सौदेबाज़ी का विषय नहीं है। यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों विशेषकर नौनिहालों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराए जहाँ वे बिना डर के पढ़ सकें, खेल सकें और विकसित हो सकें।
वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि ग्रामीणों का धैर्य जवाब दे रहा है। उनका प्रशासन पर से विश्वास डगमगा रहा है और यदि प्रशासन ने समय रहते उचित कदम नहीं उठाया, तो यह मामला ज़िला स्तर पर नहीं, राज्य स्तर पर उग्र रूप ले सकता है। ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि वे जन आंदोलन का रास्ता भी अपना सकते हैं। यह चेतावनी प्रशासन के लिए एक संकेत है कि अब सिर्फ फाइलें घुमाने का समय नहीं है, बल्कि ज़मीनी स्तर पर सक्रिय होकर काम करने की आवश्यकता है।
बाल विकास विभाग को चाहिए कि वह तत्काल टीम भेजकर भवन की तकनीकी जाँच कराए और सुरक्षा की दृष्टि से यदि भवन अनुपयुक्त पाया जाए, तो उसे तुरंत गिरवाकर वैकल्पिक व्यवस्था की जाए। इसके अलावा बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो, इसके लिए किसी सुरक्षित जगह पर अस्थायी आंगनबाड़ी केंद्र शुरू किया जाए, जब तक कि नया भवन नहीं बनता।
अंततः यह मुद्दा केवल एक भवन का नहीं है, बल्कि यह बच्चों के जीवन से जुड़ा हुआ मामला है। यदि समाज और सरकार मिलकर इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाते हैं, तो भविष्य में किसी भी प्रकार की अनहोनी से इनकार नहीं किया जा सकता। अड्डा गाँव के लोगों ने यह दिखा दिया है कि वे अब चुप बैठने वाले नहीं हैं। उन्हें अपने बच्चों की चिंता है, और वे इसके लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। अब ज़िम्मेदारी जिला प्रशासन और बाल विकास विभाग की बनती है कि वे इस मामले को प्राथमिकता देते हुए त्वरित समाधान करें और यह सुनिश्चित करें कि बच्चों को एक सुरक्षित, स्वच्छ और सशक्त वातावरण मिले, जो उनके भविष्य को मजबूत बना सके।

