उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी से कानपुर सांसद रमेश अवस्थी और शिमला सांसद सुरेश कश्यप ने की शिष्टाचार भेंट

उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी से कानपुर सांसद रमेश अवस्थी और शिमला सांसद सुरेश कश्यप ने की शिष्टाचार भेंट

जयपुर।

हाल ही में दिल्ली प्रवास के दौरान राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी से दो प्रमुख सांसदों—कानपुर से सांसद रमेश अवस्थी और शिमला से सांसद सुरेश कश्यप—ने शिष्टाचार भेंट की। यह मुलाकात न केवल एक औपचारिक भेंट थी, बल्कि इस दौरान प्रदेश और देश से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। तीनों नेताओं के बीच विकास, सुशासन और जनकल्याण से संबंधित विषयों पर खुले विचार-विमर्श ने यह संकेत दिया कि केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय को मजबूत बनाने की दिशा में ठोस प्रयास किए जा रहे हैं।

बैठक के दौरान दोनों सांसदों ने राजस्थान में वर्तमान में चल रहे विकास कार्यों की सराहना की और उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी को बधाई दी कि उन्होंने अपने कार्यकाल में राज्य की जनता के हित में कई ठोस कदम उठाए हैं। विशेषकर महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, ग्रामीण विकास और पर्यटन के क्षेत्र में राजस्थान सरकार की उपलब्धियों की जमकर तारीफ की गई। सांसदों ने कहा कि दिया कुमारी न केवल एक कुशल प्रशासक के रूप में, बल्कि एक संवेदनशील जनप्रतिनिधि के तौर पर भी जनता के विश्वास पर खरी उतरी हैं।

इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी ने भी केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को दिए जा रहे सहयोग की सराहना की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में विकास की जो रफ्तार आई है, उसका सकारात्मक असर राज्यों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। राजस्थान भी इसी दिशा में केंद्र सरकार के सहयोग से कई अहम परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है, जिनका उद्देश्य आमजन को सीधे लाभ पहुंचाना है।

दिया कुमारी ने यह भी बताया कि उनकी सरकार “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” के मंत्र को लेकर आगे बढ़ रही है और राज्य के हर वर्ग, विशेषकर किसानों, महिलाओं और युवाओं के उत्थान के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही है। उन्होंने कहा कि उनके नेतृत्व में राजस्थान सरकार पारदर्शिता, जवाबदेही और परिणामों पर आधारित शासन प्रणाली को प्राथमिकता दे रही है।

सांसद सुरेश कश्यप ने शिमला और राजस्थान के बीच पर्यटन के साझा अवसरों की चर्चा करते हुए कहा कि दोनों ही राज्य पर्यटन की दृष्टि से समृद्ध हैं और आपसी सहयोग से पर्यटन को एक नए स्तर तक ले जाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश और राजस्थान दोनों ही ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों से संपन्न हैं और इन क्षेत्रों को जोड़ते हुए एक संयुक्त पर्यटन सर्किट की परिकल्पना की जा सकती है, जिससे दोनों राज्यों की अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा।

कानपुर सांसद रमेश अवस्थी ने शिक्षा और तकनीकी नवाचारों के क्षेत्र में आपसी सहयोग की संभावनाओं पर बात करते हुए कहा कि यदि राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसी बड़ी जनसंख्या वाले राज्यों के बीच शैक्षणिक आदान-प्रदान, स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम और तकनीकी प्रशिक्षण साझा किए जाएं, तो इससे युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर मिल सकते हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि राज्य और केंद्र सरकार को मिलकर युवाओं के लिए ऐसी योजनाएं लानी चाहिए जो उन्हें आत्मनिर्भर बना सकें और स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा दे सकें।

इस शिष्टाचार भेंट में राजनीतिक से अधिक सामाजिक और विकासात्मक सोच का परिचय मिला। तीनों नेताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि राजनीति से ऊपर उठकर देशहित और जनकल्याण की भावना से कार्य करना ही आज के समय की आवश्यकता है। उन्होंने विश्वास जताया कि आपसी संवाद और समन्वय से देश के हर हिस्से में समान रूप से विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।

इसके साथ ही, चर्चा के दौरान स्वास्थ्य, जल संरक्षण, हरित ऊर्जा, और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी विचार साझा किए गए। उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी ने बताया कि राजस्थान सरकार हर गांव और हर घर तक स्वच्छ जल पहुंचाने के लिए जल जीवन मिशन के अंतर्गत कार्य कर रही है और महिला सुरक्षा के लिए ‘राजस्थान महिला सुरक्षा गारंटी योजना’ जैसे कार्यक्रमों को गति दी जा रही है।

सांसदों ने यह भी कहा कि राजस्थान में चल रहे विकास कार्यों को देखने के बाद यह विश्वास और भी मजबूत हुआ है कि राज्य सरकार केंद्र की योजनाओं को सही रूप में लागू कर रही है और इसके परिणाम भी ज़मीन पर दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने भरोसा जताया कि आने वाले समय में राजस्थान, देश के अग्रणी राज्यों में अपनी सशक्त भूमिका निभाएगा।

साथ ही, यह भी प्रस्तावित किया गया कि देश के अलग-अलग राज्यों के बीच आपसी संवाद और अनुभव साझा करने की एक सशक्त प्रणाली बनाई जाए, जिससे एक राज्य की सफल योजनाएं और मॉडल्स दूसरे राज्यों में भी लागू किए जा सकें। यह भारत को एक सशक्त और एकजुट राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

अंत में, यह मुलाकात केवल एक औपचारिक शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि एक ऐसी बैठक थी जिसमें जनकल्याण, विकास और राष्ट्रहित के कई बड़े और दूरगामी मुद्दों पर सार्थक चर्चा हुई। तीनों जनप्रतिनिधियों की साझा प्रतिबद्धता इस बात की परिचायक थी कि वे केवल अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे देश के हर नागरिक की चिंता को साझा करते हैं। यह पहल न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणा बन सकती है कि विकास और सहयोग की भावना से बड़े से बड़े लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।

इस मुलाकात के माध्यम से यह संदेश भी गया कि यदि राज्यों के नेता आपसी सहयोग, संवाद और सामूहिक प्रयास के जरिए काम करें, तो भारत को विकास के शिखर तक पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता। उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी, सांसद रमेश अवस्थी और सुरेश कश्यप की यह संयुक्त बैठक निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत है कि देश की राजनीति अब जनसेवा, विकास और राष्ट्र निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रही है।

जब न्याय के प्रहरी ही अपराधी बन जाएँ, तो कानून की आस्था कैसे बचे?

जब न्याय के प्रहरी ही अपराधी बन जाएँ, तो कानून की आस्था कैसे बचे?

भारतीय न्याय व्यवस्था की नींव सत्य और न्याय पर आधारित है। न्यायालय को हमेशा से समाज का सबसे बड़ा सहारा माना जाता रहा है। जब अन्याय पीड़ित व्यक्ति हर दरवाज़े पर ठोकर खाकर थक जाता है, तब उसे अदालत से ही उम्मीद रहती है। लेकिन यह उम्मीद तब कमजोर पड़ जाती है जब न्याय का सहारा बनने वाले लोग ही उसे अपने स्वार्थ और लालच का साधन बना लेते हैं। हाल ही में लखनऊ की अदालत ने एक वकील परमानंद गुप्ता को 29 झूठे मुकदमे दर्ज कराने के अपराध में उम्रकैद और पाँच लाख रुपये के जुर्माने की सज़ा सुनाई। यह फैसला एक उदाहरण है कि न्यायपालिका कानून का दुरुपयोग करने वालों को बख्शेगी नहीं। यह केवल एक व्यक्ति की सजा नहीं है, बल्कि पूरे समाज और न्यायिक व्यवस्था के लिए चेतावनी है कि कानून का मज़ाक उड़ाने वालों की कोई जगह नहीं।
वकील पेशे को समाज में हमेशा सम्मानित दृष्टि से देखा जाता है। वकील को केवल मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि न्यायालय का अधिकारी भी माना जाता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह सत्य और न्याय के लिए संघर्ष करेगा। लेकिन जब वही वकील झूठे मुकदमों का निर्माण करने लगे, निर्दोषों को फँसाने लगे, और अपने पेशे का इस्तेमाल व्यक्तिगत दुश्मनी या आर्थिक लाभ के लिए करने लगे, तो यह न केवल उसकी आचार संहिता का उल्लंघन है बल्कि पूरे पेशे की गरिमा पर भी प्रश्नचिह्न है। एक वकील जो अदालत में सत्य का पक्षधर होना चाहिए, अगर असत्य का सबसे बड़ा हथियार बन जाए तो समाज में न्याय की कोई गारंटी नहीं रह जाती।
झूठे मुकदमों का असर केवल आरोपित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। यह उसके परिवार, उसकी सामाजिक स्थिति और उसकी आर्थिक स्थिति तक को झकझोर देता है। वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, बेगुनाही साबित करने के लिए सबूत जुटाने पड़ते हैं और मानसिक यातना अलग से झेलनी पड़ती है। समाज भी ऐसे व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखने लगता है। इससे उसका आत्मविश्वास टूट जाता है और धीरे-धीरे कानून और अदालत पर से विश्वास उठने लगता है। यही सबसे बड़ा नुकसान है, क्योंकि न्याय पर से भरोसा खत्म होना किसी भी समाज के लिए सबसे खतरनाक स्थिति है।
झूठे मुकदमों की समस्या यह भी है कि यह असली पीड़ितों के मामलों को कमजोर करती है। जब कोई कानून, जैसे एससी-एसटी एक्ट, जिसका उद्देश्य कमजोर वर्गों की सुरक्षा करना है, झूठे मुकदमों में इस्तेमाल किया जाता है तो वास्तविक पीड़ितों की आवाज़ दब जाती है। अदालतों को यह तय करने में अधिक समय लग जाता है कि कौन-सा मामला सच है और कौन-सा झूठा। नतीजा यह होता है कि असली पीड़ितों को न्याय मिलने में देर होती है और उनका दर्द बढ़ जाता है।
इसलिए आज आवश्यकता है कि झूठे मुकदमे गढ़ने वाले और उन्हें अदालत में आगे बढ़ाने वाले वकीलों पर कठोरतम कार्रवाई हो। यदि कोई डॉक्टर लापरवाही करता है, तो उस पर केस चलता है। यदि कोई इंजीनियर खराब निर्माण करता है तो उसे दंडित किया जाता है। तो फिर वकील, जो न्याय के प्रहरी हैं, यदि झूठे मुकदमों का व्यापार करें, तो उन्हें भी आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और न्याय में बाधा डालने जैसी धाराओं में दंडित किया जाना चाहिए। उनकी प्रैक्टिस पर रोक लगनी चाहिए और बार काउंसिल को उनके लाइसेंस रद्द करने चाहिए।
यह केवल कानून की सख्ती का मामला नहीं है, बल्कि वकालत के पेशे की मर्यादा का प्रश्न है। जब तक झूठे मुकदमों के निर्माण और संचालन में शामिल वकीलों पर मुकदमे नहीं चलेंगे, तब तक यह कुप्रथा बंद नहीं होगी। अदालतें जितनी कठोर सज़ा देंगी, उतना ही यह संदेश समाज में जाएगा कि कानून का दुरुपयोग करने वालों की कोई जगह नहीं। न्याय व्यवस्था को बचाने के लिए आवश्यक है कि कानून में ऐसे प्रावधान हों जिससे झूठे मुकदमों की पहचान होने पर तुरंत कार्रवाई हो।


वकीलों की जवाबदेही तय करनी होगी। अगर यह साबित हो कि किसी वकील ने जानबूझकर मुवक्किल को झूठे मुकदमे के लिए उकसाया, तो उस पर केवल पेशेवर कार्रवाई न हो बल्कि आपराधिक मुकदमा भी दर्ज हो। इस कदम से न केवल निर्दोष लोगों की रक्षा होगी बल्कि वकालत का पेशा भी अपने वास्तविक उद्देश्य – न्याय की सेवा – के लिए जाना जाएगा। आज लखनऊ की अदालत का फैसला पूरे देश के लिए मिसाल है। इसने साबित किया है कि न्यायालय केवल आरोपी और अपराधी के बीच निर्णय करने वाला संस्थान नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की पवित्रता को भी सुरक्षित रखने वाला प्रहरी है।
यदि वकील अपने कर्तव्य से भटकेंगे, तो वे भी अपराधी की श्रेणी में आएँगे और उन्हें उसी प्रकार दंड मिलेगा जैसे अन्य अपराधियों को मिलता है। अब समय आ गया है कि समाज और न्यायपालिका दोनों मिलकर वकालत के पेशे को अपराध का साधन बनने से बचाएँ। बार काउंसिल ऑफ इंडिया को चाहिए कि वह वकीलों के लिए कठोर आचार संहिता लागू करे और झूठे मुकदमों में लिप्त पाए जाने पर तत्काल लाइसेंस रद्द करे। अदालतों को चाहिए कि वे ऐसे मामलों की सुनवाई तेज़ी से पूरी करें ताकि न्याय केवल होता हुआ नज़र ही न आए बल्कि सही समय पर मिले भी।
वकीलों को भी आत्ममंथन करना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि उनका पहला कर्तव्य केवल मुवक्किल की जीत नहीं बल्कि न्याय की जीत है। यदि इस सोच को अपनाया जाए तो न्यायालय में पेश होने वाला हर वकील समाज की नज़रों में वास्तविक प्रहरी होगा, न कि अपराध का भागीदार। न्याय केवल कागज़ों पर लिखा शब्द नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था है। और यह आस्था तभी बनी रहेगी जब न्याय के रक्षक भी पूरी ईमानदारी और जिम्मेदारी से अपने कर्तव्य का पालन करेंगे। झूठे मुकदमों से केवल अदालतों का बोझ नहीं बढ़ता बल्कि समाज का विश्वास भी टूटता है।
निर्दोष लोग जब सालों तक जेलों में सड़ते हैं, तब उनके परिवार बर्बाद हो जाते हैं। उनकी मासूम ज़िंदगियाँ खत्म हो जाती हैं। ऐसे समय में अदालतों से सख्त और स्पष्ट संदेश मिलना ही समाज को यह विश्वास दिलाता है कि न्याय जीवित है और उसकी रक्षा की जा रही है। लखनऊ का फैसला इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह न केवल एक अपराधी वकील को दंडित करने का मामला है बल्कि पूरे देश को यह चेतावनी है कि झूठे मुकदमे गढ़ने और चलाने वालों के लिए अब जगह नहीं बची है। यह संदेश हर उस वकील को याद दिलाना चाहिए जो कभी भी असत्य के रास्ते पर जाने का प्रयास करेगा।
कानून और अदालत किसी के भी दबाव या छलावे में नहीं आने वाले। इसलिए ज़रूरी है कि इस फैसले को समाज एक आदर्श की तरह देखे और इसे पूरे देश में लागू करने की कोशिश की जाए। वकीलों को भी चाहिए कि वे इस घटना से सीख लें और यह संकल्प लें कि वे अपने पेशे की गरिमा को कभी धूमिल नहीं होने देंगे। तभी न्याय वास्तव में न्याय कहलाएगा और अदालतें आम आदमी के लिए भरोसे का सबसे बड़ा आधार बन सकेंगी।

अड्डा गाँव का आंगनबाड़ी केंद्र जर्जर, अभिभावकों में डर

अड्डा गाँव का आंगनबाड़ी केंद्र जर्जर, अभिभावकों में डर

अड्डा गाँव का आंगनबाड़ी केंद्र जर्जर, अभिभावकों में डर
अड्डा गाँव का आंगनबाड़ी केंद्र जर्जर, अभिभावकों में डर

बयाना उपखंड के अड्डा गाँव में स्थित

आंगनबाड़ी केंद्र:- की जर्जर स्थिति को लेकर ग्रामीणों में भारी रोष और चिंता का माहौल है। हाल ही में देशभर में विभिन्न स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में हुए हादसों के मद्देनज़र स्थानीय अभिभावकों की चिंता और भी बढ़ गई है। इसी कड़ी में अड्डा गाँव का यह आंगनबाड़ी केंद्र अब गंभीर समस्या बन गया है, जहाँ छोटे-छोटे मासूम बच्चों की जान खतरे में है। यह भवन राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय अड्डा की चारदीवारी के भीतर स्थित है, लेकिन उसकी हालत इतनी खराब है कि कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। दीवारों में दरारें हैं, छत झुक चुकी है, प्लास्टर झड़ रहा है और बरसात के समय भवन की स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है।

ग्रामीणों का कहना है कि यह भवन वर्षों पुराना है और मरम्मत के नाम पर कभी कोई गंभीर कार्य नहीं हुआ। अब हालत यह हो चुकी है कि भवन पूरी तरह से ढहने की कगार पर है। साहब सिंह गुर्जर, अतरूप सिंह गोठिया, प्यार सिंह गवैया, लखन सिंह पटेल और अतरूप सिंह ठेकेदार सहित गाँव के कई जागरूक नागरिकों ने इस विषय में एकजुट होकर जिला प्रशासन और बाल विकास विभाग से तत्काल हस्तक्षेप की माँग की है। उन्होंने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि यदि इस खतरनाक भवन को तुरंत नहीं गिराया गया और नया भवन नहीं बनाया गया, तो वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल भेजना बंद कर देंगे। यह चेतावनी एक तरह से ग्रामीणों की हताशा और गुस्से का प्रतीक है, जो प्रशासन की निष्क्रियता को इंगित करता है।

ग्रामीणों का आरोप है कि बाल विकास विभाग को कई बार लिखित और मौखिक रूप से इस विषय में अवगत कराया गया, लेकिन विभाग ने कभी भी इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया। हर बार सिर्फ आश्वासन दिया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इस लापरवाही का खामियाजा बच्चों और उनके परिवारों को उठाना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वे अपने बच्चों को शिक्षा से वंचित नहीं करना चाहते, लेकिन उन्हें उनकी जान से भी ज्यादा कुछ नहीं प्यारा। ऐसी परिस्थिति में यदि बच्चे किसी दुर्घटना के शिकार होते हैं, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन और संबंधित विभाग की होगी।

यह भी गौर करने लायक बात है कि बाल विकास विभाग, जिसका उद्देश्य बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और सुरक्षा की व्यवस्था करना है, वह स्वयं बच्चों की सुरक्षा के प्रति इस तरह की उदासीनता दिखा रहा है। यह न केवल उनकी कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि सरकारी सिस्टम में व्याप्त लापरवाही और अकर्मण्यता को भी उजागर करता है। बच्चों की सुरक्षा कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक मानवीय विषय है और इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

ग्रामीणों ने यह भी बताया कि आंगनबाड़ी केंद्र में केवल भवन ही नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं की भी भारी कमी है। शुद्ध पेयजल, शौचालय, बिजली और साफ-सफाई जैसी आवश्यक सुविधाओं का अभाव है। ऐसे में न केवल बच्चे असुरक्षित महसूस करते हैं, बल्कि उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से भी नुकसान हो रहा है। कई अभिभावकों ने तो यह तक कहना शुरू कर दिया है कि यदि निजी संसाधनों से शिक्षा उपलब्ध कराना पड़े, तो वे उसका प्रयास करेंगे, लेकिन ऐसी खतरनाक जगह पर अपने बच्चों को भेजना अब उनके बस की बात नहीं है।

समस्या केवल एक गाँव की नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यशैली का आईना है। अगर समय रहते प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया, तो ऐसी घटनाएं अन्य गाँवों में भी सामने आ सकती हैं। और तब प्रशासन को न केवल जवाबदेही निभानी होगी, बल्कि जनआक्रोश का भी सामना करना पड़ेगा। बच्चों की सुरक्षा कोई सौदेबाज़ी का विषय नहीं है। यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों विशेषकर नौनिहालों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराए जहाँ वे बिना डर के पढ़ सकें, खेल सकें और विकसित हो सकें।

वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि ग्रामीणों का धैर्य जवाब दे रहा है। उनका प्रशासन पर से विश्वास डगमगा रहा है और यदि प्रशासन ने समय रहते उचित कदम नहीं उठाया, तो यह मामला ज़िला स्तर पर नहीं, राज्य स्तर पर उग्र रूप ले सकता है। ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि वे जन आंदोलन का रास्ता भी अपना सकते हैं। यह चेतावनी प्रशासन के लिए एक संकेत है कि अब सिर्फ फाइलें घुमाने का समय नहीं है, बल्कि ज़मीनी स्तर पर सक्रिय होकर काम करने की आवश्यकता है।

बाल विकास विभाग को चाहिए कि वह तत्काल टीम भेजकर भवन की तकनीकी जाँच कराए और सुरक्षा की दृष्टि से यदि भवन अनुपयुक्त पाया जाए, तो उसे तुरंत गिरवाकर वैकल्पिक व्यवस्था की जाए। इसके अलावा बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो, इसके लिए किसी सुरक्षित जगह पर अस्थायी आंगनबाड़ी केंद्र शुरू किया जाए, जब तक कि नया भवन नहीं बनता।

अंततः यह मुद्दा केवल एक भवन का नहीं है, बल्कि यह बच्चों के जीवन से जुड़ा हुआ मामला है। यदि समाज और सरकार मिलकर इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाते हैं, तो भविष्य में किसी भी प्रकार की अनहोनी से इनकार नहीं किया जा सकता। अड्डा गाँव के लोगों ने यह दिखा दिया है कि वे अब चुप बैठने वाले नहीं हैं। उन्हें अपने बच्चों की चिंता है, और वे इसके लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। अब ज़िम्मेदारी जिला प्रशासन और बाल विकास विभाग की बनती है कि वे इस मामले को प्राथमिकता देते हुए त्वरित समाधान करें और यह सुनिश्चित करें कि बच्चों को एक सुरक्षित, स्वच्छ और सशक्त वातावरण मिले, जो उनके भविष्य को मजबूत बना सके।

ऑनलाइन सट्टेबाजी मामले में विधायक केसी वीरेंद्र गिरफ्तार, 12 करोड़ की नकदी और 6 करोड़ के गहने-गाड़ी जब्त

ऑनलाइन सट्टेबाजी मामले में विधायक केसी वीरेंद्र गिरफ्तार, 12 करोड़ की नकदी और 6 करोड़ के गहने-गाड़ी जब्त

ऑनलाइन सट्टेबाजी मामले में विधायक केसी वीरेंद्र गिरफ्तार, 12 करोड़ की नकदी और 6 करोड़ के गहने-गाड़ी जब्त
ऑनलाइन सट्टेबाजी मामले में विधायक केसी वीरेंद्र गिरफ्तार, 12 करोड़ की नकदी और 6 करोड़ के गहने-गाड़ी जब्त

बेंगलुरु । 

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अवैध ऑनलाइन और ऑफलाइन सट्टेबाजी के मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए चित्रदुर्ग के विधायक केसी वीरेंद्र को गिरफ्तार कर लिया है। पिछले 24 घंटे में ईडी ने देशभर में लगभग 31 ठिकानों पर छापे मारे। इस दौरान, करीब 12 करोड़ रुपए की नकदी, 6 करोड़ रुपए के गहने और गाड़ियां जब्त की गईं।

ईडी ने शुक्रवार को ऑनलाइन और ऑफलाइन जुआ के मामले में चित्रदुर्ग के विधायक केसी वीरेंद्र और अन्य के खिलाफ छापेमार कार्रवाई शुरू की थी। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), बेंगलुरु जोनल कार्यालय ने प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि 22 अगस्त और 23 अगस्त को गंगटोक, चित्रदुर्ग जिला, बेंगलुरु शहर, हुबली, जोधपुर, मुंबई और गोवा समेत देशभर में 31 स्थानों पर एक तलाशी अभियान चलाया गया।

जांच में सामने आया है कि आरोपी किंग-567 और राजा567 जैसी कई ऑनलाइन जुआ वेबसाइट चला रहे थे। इसके अलावा, आरोपी का भाई केसी थिप्पेस्वामी दुबई से 3 व्यावसायिक संस्थाओं का संचालन कर रहा है, जिनका नाम डायमंड सॉफ्टेक, टीआरएस टेक्नोलॉजीज और प्राइम9 टेक्नोलॉजीज है, जो केसी वीरेंद्र की कॉल सेंटर सेवाओं और गेमिंग व्यवसाय से संबंधित हैं।

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, ईडी ने पीएमएलए-2002 के तहत छापेमारी के दौरान लगभग 12 करोड़ रुपए की नकदी बरामद की, जिसमें लगभग 1 करोड़ की विदेशी मुद्रा शामिल है। ईडी ने लगभग 6 करोड़ रुपए के सोने के आभूषण, लगभग 10 किलो चांदी के सामान और चार वाहन भी जब्त किए। इसके अलावा, 17 बैंक खाते और 2 बैंक लॉकर फ्रीज कर दिए गए।

ईडी को केसी वीरेंद्र के भाई केसी नागराज और उनके बेटे पृथ्वी एन राज के परिसर से कई संपत्ति से संबंधित दस्तावेज भी मिले, जिन्हें कब्जे में ले लिया।

जांच में पता चला है कि विधायक केसी वीरेंद्र के सहयोगी दुबई से ऑनलाइन गेमिंग वेबसाइट चलाते हैं। यह भी सामने आया है कि विधायक केसी वीरेंद्र अपने सहयोगियों के साथ गंगटोक के लिए एक व्यापारिक यात्रा पर भी गए थे, जहां वे एक कैसीनो लीज पर लेने की योजना बना रहे थे। ईडी ने कहा, “छापेमारी के दौरान जब्त सामग्री से यह संकेत मिलता है कि नकद और अन्य फंड्स की जटिल व्यवस्था की गई थी।”
शनिवार को ईडी ने गंगटोक से ही विधायक केसी वीरेंद्र को गिरफ्तार किया। फिलहाल, मामले में आगे की जांच जारी है।

मुख्तार अंसारी का बेटा उमर अंसारी गाजीपुर से कासगंज जेल शिफ्ट, अब्बास के साथ रहेगा बंद

मुख्तार अंसारी का बेटा उमर अंसारी गाजीपुर से कासगंज जेल शिफ्ट, अब्बास के साथ रहेगा बंद

परिचय:

उत्तर प्रदेश:- की राजनीति और अपराध की दुनिया में अंसारी परिवार एक चर्चित नाम रहा है। मुख्तार अंसारी, जो पूर्व विधायक और कुख्यात माफिया के रूप में जाना जाता है, के दोनों बेटों – अब्बास अंसारी और उमर अंसारी – कानून के शिकंजे में हैं। हाल ही में उमर अंसारी की जेल बदली गई है। उसे गाजीपुर जेल से स्थानांतरित कर कासगंज जेल में भेजा गया है, जहाँ पहले से उसका बड़ा भाई अब्बास अंसारी बंद है। यह घटनाक्रम तब सामने आया है जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब्बास अंसारी को एक पुराने मामले में राहत देते हुए दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है। इस रिपोर्ट में हम उमर और अब्बास अंसारी से जुड़े पूरे घटनाक्रम, उनके खिलाफ चल रहे मामलों, कोर्ट की कार्रवाई, और इसके सामाजिक-राजनीतिक असर पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं।


उमर अंसारी की जेल तबादला: घटनाक्रम और कारण

उमर अंसारी, जो कि मुख्तार अंसारी का छोटा बेटा है, को 4 अगस्त 2025 को उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार किया था। आरोप था कि उसने अदालत में फर्जी दस्तावेज दाखिल किए थे। गिरफ्तारी के बाद उसे गाजीपुर जेल में रखा गया था। लेकिन अब उसे वहां से कासगंज जेल शिफ्ट कर दिया गया है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, शनिवार सुबह 5 बजे एक पुलिस टीम उमर को लेकर कासगंज के लिए रवाना हुई।

कासगंज जेल में पहले से ही उमर का बड़ा भाई अब्बास अंसारी बंद है। ऐसे में अब दोनों भाई एक ही जेल में रहेंगे। सुरक्षा, निगरानी, और लॉ एंड ऑर्डर की दृष्टि से उमर को कासगंज स्थानांतरित करना प्रशासन की रणनीतिक योजना का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इस शिफ्टिंग के पीछे की वजह स्पष्ट नहीं की गई है।


अब्बास अंसारी को मिली हाईकोर्ट से राहत

इस घटनाक्रम की दिलचस्प बात यह है कि उमर अंसारी की जेल तबादला ठीक उसी सप्ताह हुआ, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसके बड़े भाई अब्बास अंसारी के खिलाफ चल रहे एक गंभीर मामले में दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया।

यह मामला 3 मार्च 2022 का है, जब मऊ सदर से विधानसभा चुनाव लड़ते समय अब्बास अंसारी ने एक जनसभा में सरकारी अधिकारियों को लेकर कथित तौर पर भड़काऊ भाषण दिया था। उनके इस भाषण का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसके बाद तत्कालीन इंस्पेक्टर गंगाराम बिंद की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया था।

मऊ की एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट ने इस मामले में 31 मई 2025 को अब्बास को दो साल की सजा सुनाई थी और ₹2000 का जुर्माना भी लगाया था। उनके चुनाव एजेंट मंसूर को छह महीने की कैद और ₹2000 का जुर्माना लगाया गया, जबकि उनके छोटे भाई उमर को इस मामले में बरी कर दिया गया था।

हालांकि, 20 अगस्त को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मऊ कोर्ट के फैसले को पलटते हुए अब्बास को दोषमुक्त करार दिया। इससे उनकी विधानसभा सदस्यता बहाल होने का रास्ता साफ हो गया है, जो सजा के चलते खतरे में आ गई थी।


मुख्तार अंसारी का बेटा उमर अंसारी गाजीपुर से कासगंज जेल शिफ्ट, अब्बास के साथ रहेगा बंद
मुख्तार अंसारी का बेटा उमर अंसारी गाजीपुर से कासगंज जेल शिफ्ट, अब्बास के साथ रहेगा बंद

राजनीतिक निहितार्थ और अंसारी परिवार की पृष्ठभूमि

मुख्तार अंसारी एक समय में पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ताकतवर चेहरा रहे हैं। मऊ, गाजीपुर और आसपास के जिलों में उनका प्रभाव अभी भी बना हुआ है। उन्होंने पांच बार विधायक के रूप में प्रतिनिधित्व किया और मऊ सदर सीट से वे लगातार चुनाव जीतते रहे हैं। हालांकि, उन पर संगठित अपराध, जबरन वसूली, हत्या, अपहरण जैसे कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। वर्तमान में वे आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं।

मुख्तार अंसारी के दोनों बेटे – अब्बास और उमर – भी राजनीति में कदम रख चुके हैं। अब्बास ने वर्ष 2022 में मऊ सदर सीट से सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के टिकट पर चुनाव लड़ा और विजयी हुआ। उमर ने अब तक सक्रिय राजनीति में अपनी उपस्थिति बहुत प्रमुखता से दर्ज नहीं कराई, लेकिन हाल की घटनाएं उसे लगातार सुर्खियों में ला रही हैं।

अब्बास पर कई गंभीर आरोप हैं, जिनमें आचार संहिता उल्लंघन, भड़काऊ भाषण, और अपराधियों से संबंध जैसे मामले शामिल हैं। वहीं उमर पर अदालत में झूठे दस्तावेज जमा करने जैसे आरोप हैं, जो न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के तहत गंभीर माने जाते हैं।


अदालती प्रक्रिया में तेजी और सख्त प्रशासनिक कदम

उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस प्रशासन ने अंसारी परिवार के खिलाफ हाल के वर्षों में लगातार सख्त कार्रवाई की है। मुख्तार अंसारी की जेल शिफ्टिंग से लेकर उनकी संपत्तियों पर बुलडोजर चलाने तक, सरकार ने ‘माफिया मुक्त प्रदेश’ की नीति के तहत कार्रवाई की है।

अब्बास और उमर अंसारी के खिलाफ दर्ज मामलों में त्वरित सुनवाई और दोषसिद्धि (हालांकि अब्बास की बाद में रद्द हो गई) प्रशासन के गंभीर रुख को दर्शाती है। उमर का जेल तबादला भी इसी नीति की एक कड़ी माना जा रहा है, जिससे उसकी गतिविधियों पर बेहतर निगरानी रखी जा सके और बाहरी संपर्क सीमित किया जा सके।


सामाजिक और विधिक पहलू

अंसारी परिवार पर दर्ज मामलों को सिर्फ राजनीतिक या आपराधिक नज़रिए से नहीं, बल्कि सामाजिक और विधिक दृष्टिकोण से भी देखना आवश्यक है। उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था और राजनीतिक अखाड़े में कई ऐसे उदाहरण हैं, जहां नेता आपराधिक पृष्ठभूमि से आते हैं। ऐसे में जब अदालतें सख्ती दिखाती हैं और सजा सुनाती हैं, तो यह न्याय प्रणाली में आम जनता के विश्वास को मजबूत करता है।

हालांकि, जब हाईकोर्ट जैसे उच्च न्यायालय दोषसिद्धि को निरस्त करता है, तो यह भी स्पष्ट करता है कि न्याय प्रणाली निष्पक्ष है और यदि किसी व्यक्ति के साथ अन्याय हुआ है, तो उसे सुधारने की व्यवस्था मौजूद है। अब्बास अंसारी को मिली राहत इस बात का संकेत है कि अंतिम फैसला साक्ष्यों और कानून की प्रक्रिया के आधार पर ही होता है।


जनता और मीडिया की भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया और जनता की भूमिका भी अहम रही है। भड़काऊ भाषण का वीडियो वायरल होना, जनता में इसे लेकर चर्चा, और मीडिया द्वारा निरंतर रिपोर्टिंग ने प्रशासन को कार्रवाई करने के लिए बाध्य किया। यह लोकतंत्र की शक्ति को भी दर्शाता है, जहाँ एक आम नागरिक की आवाज और एक वायरल वीडियो भी प्रभावशाली नेताओं के खिलाफ कार्रवाई का कारण बन सकता है।


निष्कर्ष:

उमर अंसारी का जेल स्थानांतरण और अब्बास अंसारी को कोर्ट से मिली राहत, दोनों घटनाएँ उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था, राजनीति, और न्याय प्रणाली के जटिल ताने-बाने को उजागर करती हैं। अंसारी परिवार, जो एक समय में पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति का मजबूत स्तंभ था, अब न्यायिक जांच और सजा प्रक्रिया से गुजर रहा है। यह स्थिति दर्शाती है कि अपराध और राजनीति का गठजोड़ अब पहले की तरह सहज और स्वीकार्य नहीं रहा।

वर्तमान सरकार द्वारा माफियाओं के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों और न्यायालयों की सक्रियता ने राज्य में एक नया संदेश देने का कार्य किया है – कि चाहे व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून से ऊपर कोई नहीं। अंसारी परिवार का भविष्य अब पूरी तरह अदालतों के फैसलों और प्रशासनिक कार्रवाई पर निर्भर करता है।

यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में नोएडा की मजबूत मौजूदगी, 15 कारोबारियों को मिलेगा मंच

यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में नोएडा की मजबूत मौजूदगी, 15 कारोबारियों को मिलेगा मंच

ग्रेटर नोएडा ।

ग्रेटर नोएडा के इंडिया एक्सपो सेंटर एंड मार्ट में होने वाले यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। इस बार ट्रेड शो में नोएडा प्राधिकरण की खास भागीदारी रहने वाली है। जानकारी के अनुसार, नोएडा की इंडस्ट्रीज के लिए 1000 वर्ग मीटर क्षेत्र आरक्षित किया गया है, जहां लगभग 15 कारोबारियों के स्टॉल लगाए जाएंगे। इन स्टॉल्स के जरिए नोएडा की औद्योगिक क्षमता, निर्यात योग्य उत्पाद और निवेश की संभावनाओं को प्रदर्शित किया जाएगा।
नोएडा प्राधिकरण के एसीईओ संजय खत्री ने बताया कि 15 कारोबारियों की सूची फाइनल हो चुकी है। ये सभी अपने-अपने उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित करेंगे। इस दौरान खास जोर विदेशी खरीदारों से ऑर्डर हासिल करने पर रहेगा, जिससे नोएडा की इंडस्ट्रीज के निर्यात को बढ़ावा मिल सके।
एसीईओ ने कहा कि नोएडा पहले से ही निर्यात के क्षेत्र में एक बड़ी पहचान बना चुका है और यहां से कई एक्सपोर्ट कंपनियां संचालित हो रही हैं। ऐसे में यह ट्रेड शो स्थानीय कारोबारियों के लिए बेहद लाभकारी साबित होगा। इस कार्यक्रम में नोएडा प्राधिकरण का भी अपना एक स्टॉल लगाया जाएगा, जहां नोएडा के विकास की गाथा और निवेशकों के लिए दी जाने वाली सहूलियतों को प्रदर्शित किया जाएगा।


इसके अलावा ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण को भी ट्रेड शो में क्षेत्र आवंटित किया गया है। हाल ही में नोएडा प्राधिकरण में एक बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें शो की तैयारियों की समीक्षा की गई और अधिकारियों को जरूरी दिशा-निर्देश दिए गए।
कैबिनेट मंत्री राकेश सचान ने भी तैयारियों का जायजा लिया और कहा कि इस ट्रेड शो के जरिए उत्तर प्रदेश को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिलेगी। खासतौर पर आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत बनाए जा रहे उत्पाद इस आयोजन में आकर्षण का केंद्र होंगे। आयोजकों के मुताबिक, इस बार ट्रेड शो में साढ़े चार लाख से अधिक लोगों के आने की उम्मीद है। इसमें देशी-विदेशी वेंडर और निवेशक भी शामिल होंगे। कारोबारियों का मानना है कि यह अवसर उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने उत्पादों को प्रमोट करने और बड़े ऑर्डर हासिल करने का बेहतरीन मंच देगा।

प्रतापगढ़ में पुलिस पर जानलेवा हमला: 6 महिलाएँ गिरफ्तार, मौताणा विवाद में हिंसा का मामला

प्रतापगढ़ में पुलिस पर जानलेवा हमला: 6 महिलाएँ गिरफ्तार, मौताणा विवाद में हिंसा का मामला

परिचय:

राजस्थान के प्रतापगढ़

जिले के कोटड़ी थाना क्षेत्र के दिवाला गाँव में हाल ही में हुई एक घटना ने न केवल कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती हिंसा और भीड़ मानसिकता को भी उजागर किया है। 21 अगस्त 2025 को दिवाला गांव में पुलिस जाप्ते पर लाठी, पत्थरों और कुल्हाड़ियों से हमला किया गया, जिससे पुलिसकर्मियों को गंभीर चोटें आईं और सरकारी जीप को भी नुकसान पहुँचा। इस मामले में पुलिस ने 6 महिला आरोपियों को गिरफ्तार किया है और अन्य आरोपियों की तलाश जारी है। यह रिपोर्ट इस घटना की पृष्ठभूमि, घटनाक्रम, कानूनी कार्रवाई और सामाजिक प्रभाव पर विस्तार से प्रकाश डालती है।

पृष्ठभूमि और तनाव की शुरुआत:

इस घटना की जड़ें 11 अगस्त 2025 को हुई एक मृत्यु से जुड़ी हैं। कोटड़ी थाना क्षेत्र के दिवाला गांव निवासी गौतम पुत्र जीवा मीणा की मृत्यु ने स्थानीय स्तर पर तनाव पैदा कर दिया। मौत के बाद परिजनों और रिश्तेदारों ने 21 अगस्त को मौताणा (एक पारंपरिक क्षतिपूर्ति मांगने की सामाजिक प्रथा) की मांग करते हुए गाँव के ही मांगीलाल पुत्र जीवा मीणा और राहुल पुत्र पुरण मीणा के घर पर हमला कर दिया। इस दौरान तोड़फोड़, आगजनी और लूटपाट की भी कोशिश की गई।

पुलिस की त्वरित प्रतिक्रिया और भीड़ का उग्र रूप:

घटना की सूचना मिलते ही कोटड़ी थाने से हेड कांस्टेबल बहादुर सिंह के नेतृत्व में पुलिसकर्मी मौके पर पहुंचे। लेकिन वहां पहले से एकत्रित भीड़, जिसमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल थे, अचानक हिंसक हो गई। इन लोगों ने पुलिस जाप्ते को घेर लिया और उन पर जानलेवा हमला कर दिया। उनके पास लाठियाँ, पत्थर और कुल्हाड़ियाँ थीं। पुलिस पर हमला सुनियोजित तरीके से किया गया, जिससे साफ था कि भीड़ किसी भी तरह से अपनी बात मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लेने को तैयार थी। इस हमले में कई पुलिसकर्मी घायल हुए और सरकारी वाहन (जीप) को गंभीर क्षति पहुँची।

गिरफ्तारी और आरोपी महिलाएं:

पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इस हमले में शामिल 6 महिला आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इनकी पहचान इस प्रकार है:

  1. पेपाबाई मीणा पत्नी अंबालाल (43 वर्ष), निवासी चाचाखेड़ी, थाना अरनोद
  2. कुशीबाई मीणा पत्नी मेधा (40 वर्ष), निवासी कनाडा, थाना अरनोद
  3. मोहनीबाई मीणा पत्नी लक्ष्मण (41 वर्ष), निवासी डोडियारखेड़ी, थाना प्रतापगढ़
  4. पूजा मीणा (25 वर्ष), निवासी डोरना भालोट, नई आबादी, मंदसौर
  5. निर्मला मीणा पत्नी गौतम (32 वर्ष), निवासी दिवाला, थाना कोटड़ी
  6. धापुड़ीबाई पत्नी जीवा (55 वर्ष), निवासी दिवाला, थाना कोटड़ी

इन सभी पर भारतीय न्याय संहिता 2023 और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम (PDPPA) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। इन धाराओं के अंतर्गत सरकारी कार्य में बाधा, हिंसा, जानलेवा हमला, और सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं।

संयुक्त पुलिस कार्रवाई और आगे की जांच:

इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रतापगढ़ एसपी बी. आदित्य के निर्देश पर कोटड़ी, अरनोद, सालमगढ़, प्रतापगढ़, हथुनिया और रठांजना थानों की पुलिस का संयुक्त जाप्ता गठित किया गया। इस टीम को न केवल गिरफ्तारियों में सफलता मिली, बल्कि उन्होंने गाँव में कानून व्यवस्था बहाल करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जांच अभी जारी है और अन्य आरोपियों की पहचान व गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे हैं।

कानूनी और सामाजिक पहलू:

यह घटना कानून व्यवस्था के लिए एक चुनौती के रूप में सामने आई है। जहां एक ओर पुलिस मृतक के परिजनों की सहायता और सुरक्षा के लिए मौके पर पहुंची थी, वहीं दूसरी ओर उन्हीं पर हमला किया गया। यह दर्शाता है कि कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी क़ानून का डर नहीं है और भीड़ मानसिकता इतनी हावी हो चुकी है कि लोग न्याय प्रक्रिया की जगह हिंसा को प्राथमिकता देने लगे हैं।

मौताणा की मांग, जो कि एक सामाजिक प्रथा रही है, अब कई बार कानून के खिलाफ जाकर हिंसक रूप ले रही है। यह प्रथा अब दुरुपयोग का माध्यम बनती जा रही है, जिसमें पारिवारिक और सामाजिक दुश्मनियों के कारण निर्दोष लोगों को भी टारगेट किया जाता है।

पुलिस पर हमला – एक गंभीर अपराध:

भारतीय कानून के अंतर्गत सरकारी कर्मचारी पर ड्यूटी के दौरान हमला एक गंभीर अपराध माना जाता है। खासकर जब पुलिस पर जानलेवा हमला किया जाए, तो उसे गैर-जमानती अपराधों की श्रेणी में रखा जाता है। इस घटना में पुलिसकर्मी घायल हुए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि हमलावरों का उद्देश्य उन्हें चोट पहुंचाना और सरकारी कार्य में बाधा डालना था।

महिलाओं की भागीदारी – एक चिंताजनक संकेत:

इस घटना में एक अन्य चौंकाने वाली बात यह रही कि महिलाओं ने भी हिंसा में सक्रिय भागीदारी निभाई। लाठियों और पत्थरों के साथ पुलिस पर हमला करना, न केवल सामाजिक असंतुलन को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि अब अपराधों में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ रही है, जो कि एक समाज के रूप में चिंता का विषय है।

प्रभाव और नीतिगत आवश्यकताएं:

यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि यह सामाजिक-सांस्कृतिक और प्रशासनिक असफलता का भी संकेत है। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी, शिक्षा और विधिक जानकारी का अभाव, और पारंपरिक रीतियों का अत्यधिक प्रभाव आज भी कानून व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। ऐसे मामलों से निपटने के लिए प्रशासन को सिर्फ पुलिस कार्रवाई पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि सामाजिक संगठनों, पंचायतों और शिक्षा संस्थानों के साथ मिलकर दीर्घकालिक समाधान खोजने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष:

दिवाला गाँव में हुआ यह हमला न केवल एक पुलिस कार्रवाई पर हमला था, बल्कि यह कानून, व्यवस्था और न्याय प्रणाली को सीधी चुनौती देने वाली घटना थी। पुलिस ने तत्परता से कार्रवाई कर 6 महिलाओं को गिरफ्तार किया, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। सभी दोषियों को न्याय के कटघरे में लाना, और इस प्रकार की हिंसक भीड़ संस्कृति पर नियंत्रण पाना अब समय की मांग है। साथ ही, समाज में जागरूकता फैलाकर लोगों को समझाना होगा कि न्याय हिंसा का नहीं, बल्कि कानून का विषय है।

यह घटना एक चेतावनी है कि यदि कानून का सम्मान नहीं किया गया, और अपराधियों को कड़ी सज़ा नहीं मिली, तो ऐसी घटनाएं बार-बार सामने आती रहेंगी। पुलिस, प्रशासन और समाज को मिलकर ऐसे मामलों से निपटना होगा, ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति या समूह कानून को हाथ में लेने की हिम्मत न कर सके।

उदयपुर में अमेरिकी नागरिकों से ठगी का बड़ा खुलासा: फर्जी कॉल सेंटर चलाकर लोन देने का झांसा, 5 गिरफ्तार

उदयपुर में अमेरिकी नागरिकों से ठगी का बड़ा खुलासा: फर्जी कॉल सेंटर चलाकर लोन देने का झांसा, 5 गिरफ्तार

उदयपुर,

जिसे झीलों की नगरी के रूप में जाना जाता है, हाल ही में एक बड़े साइबर फ्रॉड मामले के कारण सुर्खियों में आया है। हिरणमगरी क्षेत्र में चल रहे एक फर्जी कॉल सेंटर का पुलिस द्वारा भंडाफोड़ किया गया है, जो अमेरिकी नागरिकों को सस्ते लोन दिलाने के नाम पर धोखाधड़ी कर रहा था। इस मामले में उदयपुर पुलिस की सतर्कता, तकनीकी सहायता और सक्रियता की जितनी सराहना की जाए, कम है। पुलिस ने इस ऑपरेशन के दौरान अहमदाबाद, गुजरात से संबंधित पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है और मौके से महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जब्त किए हैं। यह मामला ना केवल साइबर अपराधों की बढ़ती चुनौती को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय नागरिकों को भी ऐसे गिरोह निशाना बना रहे हैं।

ऑपरेशन का नेतृत्व और टीम गठन:

पुलिस अधीक्षक योगेश गोयल के निर्देशानुसार इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया। इस विशेष कार्रवाई की निगरानी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक उमेश ओझा और डीएसपी छगन पुरोहित द्वारा की गई, जबकि थाना अधिकारी भरत योगी के नेतृत्व में एक विशेष टीम गठित की गई थी। इस टीम ने तकनीकी जांच और आसूचना (इंटेलिजेंस) के सहयोग से हिरणमगरी के सेक्टर 3 स्थित कृष्णांगन अपार्टमेंट में संचालित फर्जी कॉल सेंटर की पहचान की।

छापेमारी और बरामदगी:

पुलिस टीम द्वारा की गई छापेमारी में कॉल सेंटर से कुल 6 लैपटॉप, 10 मोबाइल फोन, 5 हेडफोन और एक नेट राउटर जब्त किया गया। ये सभी उपकरण अपराध के संचालन में उपयोग किए जा रहे थे। इनसे प्राप्त डेटा की जांच जारी है, जिससे अन्य संभावित पीड़ितों और सहयोगियों की पहचान की जा सके।

गिरफ्तार आरोपी और उनकी पहचान:

गिरफ्तार किए गए आरोपियों में सभी गुजरात, अहमदाबाद से ताल्लुक रखते हैं। इनमें शामिल हैं:

  1. कुलदीप पटेल, पुत्र मनोज भाई पटेल (34 वर्ष)
  2. सुरज सिंह तोमर, पुत्र महेन्द्र सिंह (25 वर्ष)
  3. आसु राजपूत, पुत्र राजेन्द्र सिंह (21 वर्ष)
  4. आनंद डेगामडिया, पुत्र वीठल भाई (33 वर्ष)
  5. अर्चित पाण्डेय, पुत्र ईतेन्द्र बाबु (32 वर्ष)

इन सभी को हिरणमगरी पुलिस थाने में हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है और उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता 2023 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) की विभिन्न धाराओं में प्रकरण दर्ज किया गया है।

धोखाधड़ी का तरीका (Modus Operandi):

इस गिरोह द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली अत्यंत शातिराना थी। ये आरोपी अमेरिकी नागरिकों को “वेयर एप्लिकेशन” के माध्यम से निशाना बनाते थे, जो अमेरिकी नागरिकों के मोबाइल नंबरों की जानकारी इन फर्जी कॉल सेंटर संचालकों को उपलब्ध कराता था। इसके बाद आरोपी उन नागरिकों को कॉल कर खुद को लोन एजेंट या बैंक प्रतिनिधि बताकर उन्हें यह भरोसा दिलाते कि उनका कम क्रेडिट स्कोर होने के बावजूद उन्हें आसान शर्तों पर लोन मिल सकता है – वह भी बिना किसी वैध दस्तावेज के।

जब अमेरिकी नागरिक इस “ऑफर” में रुचि दिखाते, तो आरोपी उनसे प्रोसेसिंग फीस, दस्तावेज सत्यापन शुल्क, और बीमा के नाम पर डॉलर में राशि मांगते थे। चूंकि अमेरिका में लोन संबंधी प्रक्रियाएं जटिल होती हैं और कई लोग तेज़ लोन की तलाश में रहते हैं, इस कारण कई पीड़ित इनके झांसे में आ जाते थे।

उदयपुर में अमेरिकी नागरिकों से ठगी का बड़ा खुलासा: फर्जी कॉल सेंटर चलाकर लोन देने का झांसा, 5 गिरफ्तार
उदयपुर में अमेरिकी नागरिकों से ठगी का बड़ा खुलासा: फर्जी कॉल सेंटर चलाकर लोन देने का झांसा, 5 गिरफ्तार

तकनीकी और सुरक्षा खामियों का लाभ:

यह गिरोह तकनीकी खामियों का बखूबी लाभ उठा रहा था। इंटरनेट कॉलिंग एप्लिकेशन्स (जैसे VoIP) और फर्जी ईमेल आईडी का उपयोग कर वे अपनी पहचान छिपा कर संचार करते थे। साथ ही, वे प्रॉक्सी सर्वर और VPN का भी इस्तेमाल कर रहे थे ताकि उनका लोकेशन और आईडेंटिटी ट्रेस न हो सके। इस पूरी योजना में तकनीकी विशेषज्ञता का उपयोग यह दर्शाता है कि यह कोई छोटा-मोटा फ्रॉड नहीं था, बल्कि एक संगठित अपराध था।

जांच और आगे की कार्रवाई:

फिलहाल, गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के दौरान इस बात की भी जांच की जा रही है कि इनके तार किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड नेटवर्क से जुड़े हुए हैं या नहीं। पुलिस यह भी जानने की कोशिश कर रही है कि यह गिरोह कब से सक्रिय था और अब तक कितने लोगों को धोखा दे चुका है। साथ ही, जब्त किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की फॉरेंसिक जांच की जा रही है ताकि इसमें मौजूद डेटा से और सुराग मिल सकें।

विशेष भूमिका:

इस कार्रवाई में हेड कांस्टेबल राजेंद्र सिंह और राजकुमार जाखड़ की भूमिका उल्लेखनीय रही। इन्होंने तकनीकी और खुफिया जानकारी एकत्र कर इस ऑपरेशन की सफलता में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रभाव और चिंताएं:

यह घटना दर्शाती है कि भारत में बैठे साइबर अपराधी अब वैश्विक नागरिकों को भी निशाना बना रहे हैं। इससे भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित हो सकती है। इसके अतिरिक्त, यह साइबर सुरक्षा के बढ़ते खतरे की ओर भी संकेत करता है, जहां न केवल आम नागरिक बल्कि विदेशी नागरिक भी ठगी का शिकार हो रहे हैं। इस प्रकार की घटनाएं भारत की डिजिटल इंडिया पहल के लिए भी एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करती हैं।

निष्कर्ष:

उदयपुर पुलिस द्वारा किया गया यह ऑपरेशन न केवल एक बड़ी सफलता है, बल्कि अन्य राज्यों की पुलिस के लिए एक उदाहरण भी है कि कैसे तकनीकी और इंटेलिजेंस आधारित ऑपरेशन से साइबर अपराधों को रोका जा सकता है। इस प्रकार के संगठित अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की आवश्यकता है ताकि देश और विदेश के नागरिकों का भरोसा कानून व्यवस्था पर बना रहे।

इस केस से यह स्पष्ट होता है कि साइबर अपराध अब सीमाओं से परे जा चुके हैं, और इनसे निपटने के लिए पुलिस, साइबर सेल और सुरक्षा एजेंसियों को तकनीकी रूप से अत्यधिक सक्षम होना होगा। अंततः, आम नागरिकों को भी सजग रहने की आवश्यकता है कि वे किसी भी प्रकार के ऑनलाइन लुभावने प्रस्तावों के प्रति सचेत रहें और बिना जांच किए किसी अनजान स्रोत को पैसे न भेजें।

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नई दिल्ली ।

दक्षिण-पश्चिम जिला साइबर पुलिस ने टीवी और ओटीटी उद्योग में फर्जी निर्माता-निर्देशकों के एक बड़े गिरोह का भंडाफोड़ किया है। फिल्म ‘बंटी और बबली’ से प्रेरित दो कुख्यात ठगों, तरुण शेखर शर्मा (निराला नगर, लखनऊ) और आशा सिंह उर्फ भावना (नांगलोई, दिल्ली) को बेंगलुरु से गिरफ्तार किया गया।
ये दोनों स्टार प्लस और हॉटस्टार पर प्रसारित एक लोकप्रिय धारावाहिक में भूमिका दिलाने का झांसा देकर भोले-भाले लोगों को ठग रहे थे। इनके पास से 7 स्मार्टफोन, 10 सिम कार्ड, 8 एटीएम कार्ड, 15 बैंक चेकबुक/पासबुक और एक सोने का टॉप बरामद हुआ।

मामला तब सामने आया जब रघु नगर, डाबरी की एक महिला ने एनसीआरपी (नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल) पर शिकायत दर्ज की। उनकी नाबालिग बेटी एकता कपूर की अकादमी से अभिनय का डिप्लोमा कर रही थी। उसने स्टार प्लस के एक धारावाहिक में काम पाने के लिए फेसबुक पर एक विज्ञापन देखा। लिंक पर क्लिक करने पर उसे व्हाट्सएप नंबर पर रीडायरेक्ट किया गया, जहां पीयूष शर्मा नामक व्यक्ति ने खुद को पूर्व एमटीवी स्प्लिट्सविला प्रतिभागी और निर्देशक बताया।

उसने पीड़िता का पोर्टफोलियो मांगा और फिर फर्जी निर्माता राजन शाही और सिंटा की कथित एचआर निदेशक अनीता से संपर्क करवाया। झांसे में आकर पीड़िता ने 24 लाख रुपए ट्रांसफर किए, लेकिन बाद में उसे ब्लॉक कर दिया गया।

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मामले की गंभीरता को देखते हुए, इंस्पेक्टर प्रवेश कौशिक और सहायक पुलिस आयुक्त विजयपाल सिंह तोमर के नेतृत्व में एक विशेष टीम गठित की गई। इसमें एसआई ओपेंद्र सिंह, हेड कांस्टेबल अशोक, बाबूलाल, जय प्रकाश और कांस्टेबल जीतू राम शामिल थे।

तकनीकी निगरानी से पता चला कि आरोपी लखनऊ, गुजरात, मध्य प्रदेश, केरल और कर्नाटक के प्रीमियम होटलों से ठगी करते थे। बेंगलुरु में छापेमारी के बाद दोनों आरोपियों को एक 2 बीएचके सर्विस अपार्टमेंट से गिरफ्तार किया गया।

पूछताछ में खुलासा हुआ कि तरुण और आशा ने यूट्यूब वीडियो से ठगी का हुनर सीखा था। वे व्हाट्सएप के जरिए पीड़ितों से संपर्क करते और बार-बार सिम कार्ड, बैंक खाते और ठिकाने बदलते थे। 20 से ज्यादा एनसीआरपी शिकायतें और जम्मू-कश्मीर में एक मामला इनसे जुड़ा है। पुलिस अब अन्य पीड़ितों की तलाश में है।

AGTF की कार्रवाई: दो हथियार तस्कर गिरफ्तार, लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नेटवर्क का पर्दाफाश

AGTF की कार्रवाई: दो हथियार तस्कर गिरफ्तार, लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नेटवर्क का पर्दाफाश

जयपुर: राजस्थान में अवैध हथियारों के जाल पर एंटी गैंगस्टर टास्क फोर्स की बड़ी कार्रवाई, दो हथियार तस्कर गिरफ्तार

राजस्थान में अपराधियों के नेटवर्क पर शिकंजा कसने के लिए राज्य पुलिस की एंटी गैंगस्टर टास्क फोर्स (AGTF) लगातार सक्रिय है। इसी क्रम में जयपुर मुख्यालय से मिली जानकारी के अनुसार, AGTF ने हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर पुलिस के साथ मिलकर एक बड़ी सफलता हासिल की है। इस संयुक्त ऑपरेशन में दो कुख्यात हथियार तस्करों को गिरफ्तार किया गया है, जिनके कब्जे से तीन अवैध देशी पिस्टल (.32 बोर) और पाँच मैगज़ीन बरामद की गई हैं। यह ऑपरेशन न सिर्फ हथियार तस्करी रोकने की दिशा में एक बड़ी कामयाबी है, बल्कि इससे गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के नेटवर्क की जड़ें राजस्थान में कितनी गहरी हैं, इसका भी अंदाजा लगाया जा सकता है।

इस पूरे ऑपरेशन का नेतृत्व वरिष्ठ अधिकारी एडीजी दिनेश एम. एन. ने किया, जो राजस्थान पुलिस में संगठित अपराध के खिलाफ सख्त कार्यवाही के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने बताया कि कार्रवाई दो अलग-अलग जिलों में अलग-अलग समय पर की गई। पहली गिरफ्तारी श्रीगंगानगर के सादुलशहर क्षेत्र में हुई, जहां पुलिस ने गुरमीत सिंह (40) नामक एक व्यक्ति को एक अवैध देशी पिस्टल के साथ दबोच लिया। प्रारंभिक पूछताछ में गुरमीत सिंह ने खुलासा किया कि उसने यह हथियार जगतार सिंह उर्फ काला से लिया था, जो पहले से ही पुलिस के रडार पर था। इस बयान ने जांच को एक नया मोड़ दिया और गैंग के अन्य सदस्यों की तलाश तेज़ कर दी गई।

दूसरी महत्वपूर्ण गिरफ्तारी हनुमानगढ़ जिले के रावतसर कस्बे से हुई, जहां पुलिस ने 21 वर्षीय अभिषेक जाट को दो देशी पिस्टल और चार मैगज़ीन के साथ रंगे हाथों पकड़ लिया। पूछताछ में अभिषेक ने बताया कि वह ये हथियार सोनू भांभू नामक तस्कर से खरीद चुका था। गौरतलब है कि सोनू भांभू हाल ही में उत्तराखंड से गिरफ्तार किया गया एक कुख्यात हथियार तस्कर है, जिसके संबंध सीधे गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई गिरोह से जुड़े हुए हैं। सोनू की गिरफ्तारी के बाद ही AGTF ने हथियार तस्करी के इस पूरे नेटवर्क पर निगरानी बढ़ा दी थी।

एडीजी दिनेश एम. एन. के अनुसार, सोनू भांभू की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में यह तथ्य सामने आया कि वह अब तक राजस्थान में 131 से अधिक अवैध हथियार सप्लाई कर चुका है। यह संख्या न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि हथियार तस्करी का यह नेटवर्क कितना विस्तृत और संगठित है। सोनू ने पुलिस को बताया कि वह अलग-अलग जिलों में स्थानीय एजेंट्स के माध्यम से हथियारों की आपूर्ति करता था। इनमें से कई एजेंट कॉलेज छात्र, बेरोजगार युवा और पुराने अपराधी थे, जिन्हें पैसे का लालच देकर इस अवैध धंधे में घसीटा गया।

यह मामला एक सप्ताह पहले हनुमानगढ़ में की गई एक और कार्रवाई से भी जुड़ा है। तब AGTF ने इस गिरोह के 11 अन्य आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से 6 अवैध हथियार बरामद किए थे। उस समय भी पुलिस ने यह जानकारी दी थी कि यह नेटवर्क लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़ा हुआ है और हथियार तस्करी के लिए राजस्थान को एक बड़े ट्रांजिट पॉइंट की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे में हालिया गिरफ्तारी और हथियारों की जब्ती इस ऑपरेशन का अगला महत्वपूर्ण चरण मानी जा रही है।

इस संयुक्त ऑपरेशन में AGTF इंस्पेक्टर सुभाष सिंह तंवर की टीम के साथ हनुमानगढ़ की डीएसटी (District Special Team) ने मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन टीमों ने गुप्त सूचना के आधार पर पहले निगरानी रखी, फिर दोनों आरोपियों को अलग-अलग स्थानों से गिरफ्तार किया। इन अभियानों में गहन तकनीकी विश्लेषण, मोबाइल लोकेशन ट्रैकिंग और स्थानीय खुफिया तंत्र का व्यापक इस्तेमाल किया गया। गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के दौरान कई अन्य संदिग्ध नामों की पहचान हुई है, जिनके खिलाफ अब आगामी चरणों में कार्रवाई की तैयारी की जा रही है।

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि राजस्थान में लॉरेंस बिश्नोई गिरोह और उसके सहयोगी तस्करों की गतिविधियों पर पिछले कुछ महीनों से पैनी नजर रखी जा रही थी। लॉरेंस बिश्नोई गैंग की सक्रियता खासकर राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और उत्तर भारत के अन्य राज्यों में लगातार बढ़ रही थी, और इसके लिए अवैध हथियारों का इस्तेमाल आम बात हो गई थी। इस गिरोह के सदस्य सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं को आकर्षित करते हैं और फिर उन्हें अपराध की दुनिया में शामिल करते हैं। इसीलिए पुलिस ने न केवल धरपकड़ अभियान तेज किया है, बल्कि साइबर निगरानी और सोशल मीडिया विश्लेषण के माध्यम से भी गैंग की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है।

इस बीच, पुलिस अधिकारियों ने आम जनता से भी सहयोग की अपील की है। उन्होंने कहा कि यदि किसी को भी अपने इलाके में हथियारों की संदिग्ध गतिविधियों, संदिग्ध व्यक्तियों या हथियार तस्करों की जानकारी हो, तो वह तुरंत पुलिस को सूचित करे। पुलिस की गुप्त सूचना तंत्र पूरी तरह सुरक्षित है और जानकारी देने वाले की पहचान को गोपनीय रखा जाता है।

राजस्थान पुलिस की यह कार्रवाई राज्य में संगठित अपराध के खिलाफ चल रहे “ऑपरेशन क्लीन” का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य न केवल अपराधियों को पकड़ना है, बल्कि उनके पूरे नेटवर्क को जड़ से समाप्त करना है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, आने वाले दिनों में इस नेटवर्क से जुड़े और भी कई नामों का खुलासा हो सकता है, जिनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

निष्कर्षतः, यह कार्रवाई राजस्थान पुलिस की प्रतिबद्धता को दर्शाती है कि वह राज्य को अपराध मुक्त बनाने की दिशा में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। हथियार तस्करी जैसे गंभीर अपराध को जड़ से खत्म करने के लिए पुलिस की तकनीकी, खुफिया और मैदानी टीमें लगातार काम कर रही हैं। दो तस्करों की गिरफ्तारी और अवैध हथियारों की बरामदगी निश्चित ही एक बड़ी कामयाबी है, लेकिन यह भी स्पष्ट संकेत है कि अपराधियों के खिलाफ यह लड़ाई अभी जारी है। आने वाले समय में पुलिस की और भी बड़ी कार्रवाइयों की उम्मीद की जा रही है, जिससे अपराधियों के मन में भय और आमजन में विश्वास कायम रह सके।