
सिरसा (हरियाणा) में राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (SVACB), हिसार की कार्रवाई ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई में सतर्कता एवं निष्कपट दृष्टिकोण कितनी महत्वपूर्ण है। 9 अक्टूबर 2025 को, रानियां थाना क्षेत्र के सहायक उप निरीक्षक (ASI) अनिल कुमार को भ्रष्टाचार के एक गंभीर आरोप में रंगे हाथ गिरफ्तार किया गया। आरोप यह है कि उसने शिकायतकर्ता से ₹26,000 नकद रिश्वत ली, ताकि वह संबंधित चालान को न्यायालय में प्रस्तुत कर दे। इस गिरफ्तारी की पृष्ठभूमि, आरोपों की गंभीरता और इनके व्यापक निहितार्थों को यदि हम विस्तार से देखें तो यह घटना सिर्फ एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी का मामला न होकर उस प्रणाली की कमजोरियों और सुधार की जरूरतों को उजागर करती है जिसमें न्याय और प्रशासन दोनों ही शामिल हैं।
भ्रष्टाचार की शिकायतें अक्सर सामान्य नागरिकों के कानों तक पहुँचती हैं, लेकिन उनकी जांच और कार्रवाई होने में बहुत समय लगता है। इस मामले में, शिकायतकर्ता ने पहले ही यह आरोप लगाया था कि ASI अनिल कुमार ने उसके पिता से पहले ₹10,000 नकद ऐंठ लिए थे। इसके बावजूद, चालान अदालत में पेश नहीं किया गया। इस प्रकार, न केवल रिश्वत की उम्मीद की गई, बल्कि भ्रष्ट तंत्र ने प्रक्रिया को बाधित कर दिया। ऐसी स्थितियाँ न्याय की अवधारणा को भी चुनौती देती हैं। यह उम्मीद की जाती है कि पुलिस या जांच अधिकारी निष्पक्ष कार्य करें, लेकिन जब वही अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग करते हैं, तो जनता का विश्वास टूटता है।
मामला और भी संवेदनशील है क्योंकि यह सीधे जेल में बंद अभियुक्त और उसकी कानूनी प्रक्रिया से संबंधित है। शिकायतकर्ता ने बताया कि उसका भाई करीब 80 दिन से सिरसा जेल में बंद है, जिनका मुकदमा (मुकदमा नंबर 364/2025) उसी ASI अनिल कुमार की देखरेख में था। यह खुद एक असंतुलन की स्थिति है—अदालत में प्रस्तुत करने का काम और अभियुक्त की रक्षा एवं जांच की जिम्मेदारी एक ही व्यक्ति के हाथों होने से पारदर्शिता खतरे में आ जाती है। 8 अक्टूबर को जब शिकायतकर्ता ने अपने भाई का चालान प्रस्तुत करवाने के लिए ASI अनिल कुमार से संपर्क किया, तो उसने ₹26,000 नकद रिश्वत की मांग की। इस तरह की सीधे‑साधे रिश्वत की मांग न केवल आपराधिक है, बल्कि न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांतों—निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही—को भी ठेस पहुंचाती है।
रिश्वत लेने का यह तंत्र सामाजिक न्याय के लिए खतरनाक संकेत है। यदि अधिकारी अपनी जांच प्रक्रिया में ही मोहताज हो जाएँ, तो किस तरह से दोषियों को सज़ा मिलेगी? किस तरह से निर्दोष लोगों को न्याय मिलेगा? ऐसे मामलों में यह देखा जाना चाहिए कि आरोप कितने प्रमाणित होते हैं, यह कार्रवाई कितनी त्वरित और निष्पक्ष होती है, और आरोपी अधिकारी को कानूनी तौर पर किस प्रकार की सजा दी जाएगी। इस गिरफ्तारी के बाद, SVACB हिसार ने इस मामले में अभियोग संख्या 39 दिनांक 9.10.2025 पंजीकृत की है, जिसमें धारा 7 पीसी एक्ट, 1988 के तहत मामला दर्ज किया गया है। यह एक गंभीर कदम है, क्योंकि धारा 7 भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में एक कठोर प्रावधान है, जिसका उद्देश्य इस तरह की गंभीर अक्षमताओं को रोकना है।
इस कार्रवाई का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह न केवल एक अधिकारी को दंडित करने की दिशा में है, बल्कि यह एक संदेश देता है—कि भ्रष्ट अधिकारी सुरक्षित नहीं हैं। यह उन लोगों के लिए एक उदाहरण है जो अपनी स्थिति का दुरुपयोग कर न्याय प्रक्रिया को बाधित करना चाहते हैं। यदि ऐसी कार्रवाई नियमित और निष्पक्ष रूप से की जाए, तो भ्रष्टाचार पर नियंत्रण संभव हो सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब जांच एजेंसियाँ स्वतंत्र हों, सामग्री को प्रभावी तरीके से जांच सकें और अभियोजन पक्ष कार्रवाई को जल्दी आगे बढ़ा सके।

यह घटना सामाजिक विश्वास की बहाली के लिए आवश्यक है। जनता को यह विश्वास होना चाहिए कि यदि वह भ्रष्टाचार की शिकायत करती है, तो उस पर गंभीरता से विचार किया जाएगा और दोषियों को जल्द सज़ा दी जाएगी। सिर्फ कार्रवाई के डर से भ्रष्टाचार रुक नहीं पाएगा — बल्कि यह निर्भयता, पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यवस्था ही इसे रोक सकती है। इस घटना की रिपोर्टिंग और उसकी व्यापक चर्चा भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आम नागरिकों को यह अनुभव कराने का अवसर देती है कि यदि वे सच्चाई के साथ आगे आयें तो कानूनी व्यवस्था उन्हें साथ दे सकती है।
आगे की चुनौतियाँ कम नहीं हैं। एक तो यह सुनिश्चित करना कि इस मामले की जांच में किसी प्रकार की राजनीति या अन्य दबाव न हो। दूसरे, यह देखना कि आरोप सिद्ध होते हैं या नहीं — यानी न्यायालय में सबूतों की गुणवत्ता, गवाहों की विश्वसनीयता और अभियोजन पक्ष की त्वरित कार्रवाई। तीसरा, यह सुनिश्चित करना कि इस मामले में एसआई अनिल कुमार को न केवल गिरफ्तार किया जाए बल्कि दोषी पाए जाने पर सख्त सजा मिले, जिससे यह संदेश व्यापक स्तर पर जाए कि पद का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इस घटना से यह भी संकेत मिलता है कि प्रशिक्षित, ईमानदार और जवाबदेह अधिकारियों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है। साथ ही भ्रष्टाचार रोकने वाले यंत्रों — जैसे वीडियो रिकॉर्डिंग, इलेक्ट्रॉनिक ट्रैकिंग, शांतिपूर्ण शिकायत प्रणाली और निगरानी — को और मजबूत किया जाना चाहिए। पुलिस विभागों और जांच संस्थाओं को नियमित ऑडिट और समीक्षा के दायरे में लाया जाना चाहिए। यदि इन यंत्रों को लागू किया जाए, तो ऐसे मामलों की संभावना कम होगी। न्यायपालिका, पुलिस प्रशासन और नागरिक समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कानून केवल लिखित रूप से न हो, बल्कि व्यवहार में लागू हो।
समग्र रूप से देखा जाए, तो यह मामला न केवल एक भ्रष्ट अधिकारी को अंकुश लगाने की दिशा में है, बल्कि न्याय व्यवस्था, पुलिस प्रणाली और सामाजिक विश्वास के संरचनात्मक सुधार की आवश्यकता को भी उद्घाटित करता है। SVACB की यह कार्रवाई इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि इस तरह की कार्रवाइयाँ नियमित, निष्पक्ष और निर्भय रूप से जारी रहीं, तो भ्रष्टाचार की जड़ें धीरे-धीरे कम हो सकती हैं और न्याय का संकल्प अधिक सुदृढ़ हो सकेगा।



















